शनिवार, 18 अप्रैल 2020

शिलान्यास (कहानी)



शिलान्यास

          पंडित कृपाशंकर विरोधी खेमे से बिल्कुल सहमत नहीं थे। उनका कहना था,कमज़ोरी का दूसरा नाम है दिल। दिल हालांकि कभी-कभी दीवार की तरह मज़बूत हो सकता है और दीवार दिल की तरह कमज़ोर लेकिन दिमागी फैसले दिल के स्तर पर नहीं किए जा सकते। आप ठंडे दिमाग से काम लीजिए, भावुकता में मत बहिए।” इतना कहते-कहते पंडित जी खुद भावुक हो गए, जिस आदमी ने अपनी सारी ज़िंदगी गाँव की सेवा में खपा दी हो और जिसने गाँव के हित को ही अपना हित और अहित को अपना अहित समझा हो, ऐसा आदमी पार्टी और खेमेबंदी से ऊपर होता है। दूसरों के लिए घर जुटाने वाला ये आदमी आज भी खंडहरनुमा कमरे में रहता है-अकेला और बीमार। ऐसे महान सेवकराम जी के नाम पर गाँव की मुख्य सड़क का शिलान्यास क्यों नहीं हो सकता?”
          अब विरोधी दल के गौतम जी कहने लगे, हम मानते हैं पंडिज्जी कि लाला सेवकराम जी ने इस गाँव की बहुत सेवा की है। उन्होंने एक से बढ़कर एक काम किए हैं, लेकिन स्वर्गीय कालूप्रसाद जी का योगदान भी तो कुछ कम नहीं। स्वर्गवासी व्यक्ति ज्यादा वंदनीय और महत्वपूर्ण होता है। ज़िंदों को इस बात का हक नहीं है कि वे अपनी कब्र खुदने से पहले अपना नाम किसी पत्थर पर खुदवाएं। इससे हमारे कालूप्रसाद जी की आत्मा को कष्ट पहुँचेगा। कालू जी ने इस गाँव के लिए अपनी जान की कुर्बानी दी है, भले ही गंभीर रोग में पड़कर दी हो। लेकिन क्या फ़र्क पड़ता है, महापुरुषों की जान महत्वपूर्ण होती है, जान जाने का कारण नहीं। अब सड़क के नाम का पत्थर लगेगा तो कालू जी के नाम पर ही वरना उनकी आत्मा को चैन नहीं मिलेगा। उन्हें बड़ा कष्ट होगा और हम एक मरहूम आत्मा को कष्ट देकर अपमानित नहीं कर सकते।”
          पंडित जी ने किचकिचा कर कहा, उन्हें कष्ट न देने के लिए एक अच्छे-भले जिंदे आदमी को कष्ट पहुँचा सकते हैं आप?”
पंडिज्जी, आदमी का जन्म तो कष्ट भोगने के लिए ही हुआ है। लेकिन कम-से-कम मरने के बाद तो उन्हें सुख-सम्मान देने की कोशिश की जानी चाहिए। मेरा ख़्याल है कि ये सभा मेरे ख़्याल की हमख़्याल होगी।” इतना कहकर गौतम जी चुप हो गए तो पंडित कृपाशंकर जी ने तमतमा कर कहा, अपना ख़्याल अपने भेजे में रखिए। हमारे लाला जी की उपलब्धियों को यूँ दरकिनार नहीं किया जा सकता। माना कि वे आज न ज्यादा बोल पाते हैं, न ज्यादा चलते हैं लेकिन उनके द्वारा किए गए लोकहित के काम हमारे विरोधियों के सीने पर मूंग दलते हैं। उन्होंने अपनी टांगों की मज़बूती गाँव भर की कमज़ोरी दूर करने के लिए ही खोई है। पहला हक उन्हीं का बनता है।”
          इसके विरोध में एक नौजवान उठ खड़ा हुआ और बोला, उन्होंने अपने पैर गाँव की कमज़ोरी दूर करने में नहीं बल्कि एक्सीडेंट में खोए हैं। पंडिज्जी महाराज, कोई सड़क पर आँखें बंद करके चलेगा तो यही होगा न। और उसी सड़क का नाम आप उनके नाम पर रखकर क्या संदेश देना चाहते हैं।”
पंडितजी का चेहरा अपमान से लाल हो गया, तब तो आप यह भी कहेंगे कि उन्होंने अपनी आँखों की रोशनी जीवन भर गरीब बच्चों को लालटेन में पढ़ा कर नहीं खोयी बल्कि वह उनसे अपने आप ही तलाक लेकर चली गई।”
इस पर एक कोने से आवाज़ आई, अब ये बात हमसे क्यों पूछते हैं, जाकर उनके मोतियाबिंद से पूछिए।”
मगर पंडित जी अड़े थे, लाला जी बेहद काबिल हैं।”
कोई ज़ोर से फुसफुसाया, बिल्कुल जी, बिल्कुल, बेहद काबिल हैं, सिर्फ देखने, चलने-फिरने, उठने-बैठने और ज्यादा बोलने के ही काबिल नहीं हैं। बाकी तो बहुत काबिल हैं।”
उनके हम पर बड़े अहसान हैं।”
किसी ने उठकर कहा, तो ये बात हमें सुनाकर घर की बात सार्वजनिक क्यों कर रहे हैं? जाइए और जाकर उनके अहसान उतारिये। यहाँ वक्त क्यों ख़राब कर रहे हैं?”
पंडित जी तिलमिलाकर बोले, आप लाला जी का अपमान कर रहे हैं।”
मगर मैं तो आपसे बातें कर रहा हूँ” पीछे से फिर आवाज़ आई।
तो क्या हुआ, अपमान तो लालाजी का ही हुआ ना। अरे हम छोटों का क्या है, कोई भी नासपीटा कुछ भी कहकर चला जाए पर अपमान तो बड़ों का ही होता है। हम लालाजी के इस अपमान को बर्दाश्त नहीं करेंगे।”
इतना सुनने पर बीड़ी जले दाँतों वाले एक सज्जन ने अपनी तमाम छेद वाली धोती सँभालते हुए कहा, बर्दाश्त तो आपसे अपनी पहली बीबी भी नहीं हुई थी पंडिज्जी। तभी उसे छोड़कर दूसरा ब्याह रचाने को डांय डांय मारे मारे फिर रहे हो।”
पंडित जी चीखकर बोले, सभा में व्यक्तिगत मामले मत उठाइए।”
सही बात है, इससे सार्वजनिक अपमान होता है,” किसी ने बड़े ज़ोर से कहा।
दूसरे ने कहा, चलिए इस बारे में आपके घर आकर एकांत में बात करेंगे। कोई औरत निगाह में है क्या?”
सारी सभा हँस-हँस कर लोटपोट हो गई। खीजे और खिसियाए हुए पंडित जी झेंपपर बैठ गए। उनके बैठते ही कालू जी की पार्टी के लालसिंह मेहता खड़े हुए। उनके उठते ही सभा में पचासों आदमी भी उठ खड़े हुए और सभा छोड़कर चल दिए। लालसिंह ने पान की पीक को तेजी से सटकते हुए कहा, अरे भाईलोग आप कहाँ चल दिए?” इस पर जाते हुओं में से एक ने घूमकर कहा, आपको सुनने से अच्छा है कि घर जाकर बीबी की मनहूस शक्ल देख लें।”
नहले पर दहला जड़ते हुए लालसिंह ने कहा, पर क्या भाभी जी भी इस वक्त आपकी इस वाहियात सूरत को देखना चाहेंगी? शाम तो ढलने दें।”
अरे पसंद करे या न करे, देखनी तो पड़ेगी ही, कानूनी बाध्यता है।”
तो फिर जाइए, घर जाकर कानून का गैर-कानूनी इस्तेमाल कीजिए।” कहकर लालसिंह ने खीसें निपोर दीं। सारे लोग एकबार फिर ठठाकर हँस पड़े। ठहाके कुछ कम हुए तो लालसिंह ने कहा, अच्छा अब अपनी बत्तीसी बंद करो और.....”
इससे पहले कि वे वाक्य पूरा कर पाते, एक बुजुर्ग बोले, अरे भईया, अब बतीसी किस के पास रह गई है, दो चार दाँत से ही काम चला रहे हैं। सामने वालों से हँसते हैँ और पीछे वालों से खाते हैं।”
लालसिंह ने तुनककर कहा, मैं आपकी नहीं बल्कि उनकी बात कर रहा था जिनकी बत्तीसी अभी सलामत है। आप तो बंद करने की बजाय अपना थोबड़ा खुला ही रखिए, दो चार मक्खियों को गर्मी से थोड़ी राहत मिल जाएगी।”
बुजुर्ग का मुँह बंद हो गया लेकिन बाकी लोगों के दाँत फट पड़े। छींटाकशी कम हुई तो लालसिंह ने गंभीर होकर कहा, अच्छा अब मज़ाक छोड़िए और मेरे कुछ सवालों का पार्टी और दलगत खेमेबंदी से उठकर जबाव दीजिए।”
कुछ लोग कुर्सियाँ छोड़ कर उठने लगे तो लालसिंह बोले, मैंने खेमेबंदी से ऊपर उठने को कहा है, कुर्सियों से नहीं। अच्छा बताइए, ज्यादा पूजनीय कौन होता है छोटा या बड़ा?”
आवाज़ें आईं, बड़ा, बशर्ते छोटों की जान वेवज़ह न खाता हो।”
सच्चाई जीवन है या मृत्यु?” लालसिंह ने दूसरा सवाल दागा।
सभा चिल्लाई, मृत्यु बशर्ते जीते जी न आए।”
माला किस पर चढ़नी चाहिए-जिंदे या स्वर्गवासी पर?”
कुछ नौजवान चिल्लाए, स्वर्गवासी पर मगर अपवादस्वरूप जिंदे नेताओं पर भी। एक आपके लिए भी लाए हैं। बताइए कब पहनेंगे अभी या स्वर्गवासी होने पर?”
लालसिंह भन्नाकर बोले, मैं अपवादों की बात नहीं कर रहा हूँ। मूल समस्या से मत भटकिए। अच्छा एक बात और बताइए, जो सेवा करे वह बड़ा है या जो ख़ुद को सेवक कहे वह बड़ा है?”
जोश-जोश में सारी सभा चिल्ला पड़ी, जो सेवा करे वह बड़ा है।”
लालसिंह ने दोगुने जोश में भरकर कहा, लो जी, हो गया फैसला। सड़क का शिलान्यास माननीय सेवकराम जी के नाम पर नहीं बल्कि स्वर्गीय श्रद्धेय कालूप्रसाद के नाम पर होगा।”
          उनके इतना कहते ही सारी सभा में हो हल्ला मच गया। लालसिंह पर बातें घुमाने-फिराने, लोगों को बेवकूफ बनाने, औरों के मुँह से ग़लत ढंग से अपनी मनपसंद बात कहलवाने, आम आदमी को राजनीतिक पैंतरेबाज़ी में फँसाने जैसे आरोपों-प्रत्यारोपों के बीच सभा का सत्रावसान हो गया। उसी रात दमे के रोगी लाला सेवकराम जी का भी दम घुटने से देहावसान हो गया।

          अनेक अंतर्विरोधों के बावजूद अंतिम विदाई पर अन्तत: पूरा गाँव जुटा। जब उनका अंतिम संस्कार किया जा रहा था तो उस समय उनकी पार्टी के सबसे बड़े नेता आत्माराम जी ने संपूर्ण गाँववालों की मौजूदगी में सुबकते हुए कहा, कालू जी के साथ अब तो लाला जी भी नहीं रहे। सब जानते थे कि उनका योगदान कालू जी से कहीं ज्यादा था पर जाने कितनों को उनके जिंदा होने का मलाल था। उनकी काली जीभ ने अपना कमाल दिखा दिया। एक रात में ही लाला जी ने अपना नश्वर शरीर त्याग दिया।” सारी निगाहें लालसिंह पर टिक गईं जिन्होंने कल ही जिंदा और स्वर्गवासी नेताओं की तुलना की थी।
उधर आत्माराम जी का सुबकना जारी था, अब हम सबको भी अपने मतभेद और मनभेद त्याग देने चाहिए। बैर और वैमनस्य त्याग देना चाहिए। पिछली आत्मा का तो पता नहीं लेकिन कहते हैं कि तुरंत मरने वाली की आत्मा तेरहवीं होने तक उसके घर के आसपास ही भटकती है। ऐसे में लालाजी की आत्मा भी हमें देख सुन रही होगी। अब हमें उनकी अदृश्य मौजूदगी में ही गाँव की मुख्य सड़क का नाम लालाजी के नाम पर कर देना चाहिए।”
          बहुत से विरोधी कुछ कहने को आतुर थे लेकिन हालात ने उनकी जीभों को दाँतों के बीच और जिनके दाँत नहीं थे, उनके मसूड़ों के बीच फँसा दिया। वे न चाहकर भी चुप रहे। सर्वसहमति न होते हुए भी सर्वसम्मति से बात तय हो गयी। अगले ही दिन सड़क का शिलान्यास लालाजी के नाम पर कर दिया गया।
          लालाजी की इस सामयिक मौत पर विरोधी खेम में दु:ख और पीड़ा के असामयिक बादल छाए हुए थे। वहीं उनके अपने खेमे में मृत्यु का दर्द कम हर्ष का माहौल ज्यादा था। सब उनके मरने की टाइमिंग को सलाम कर रहे थे। जीते जी ही नहीं उन्होंने मरने पर भी पार्टी को सिर उठाने का मौका दे दिया था। आखिर इतने बड़े मुद्दे पर उनकी पार्टी को सफलता का सेहरा उनकी समसामयिक मौत ने ही पहनाया था। लालाजी ने सही समय पर महाप्रस्थान करके अपनी पार्टी की सारी मुश्किलों को आसान कर दिया था। इधर रामधुन चल रही थी, उधर विरोधी सिर धुन रहे थे।
          पार्टी कार्यालय में पार्टी कार्यकर्ताओं की बैठक हुई। आत्माराम जी बार-बार लालाजी के गुण गाते न थकते कि किस तरह उन्होंने जीते जी और मरने के बाद भी अपनी पार्टी का हित किया। आखिर सड़क का शिलान्यास उन्हीं के नाम पर हुआ और कद पार्टी का बड़ा हो गया। आत्माराम जी ने कहा, पार्टी कार्यकर्ताओं ने भी बहुत मेहनत की है। उन्हें इसका पुरस्कार दिया जाना चाहिए।” इस पर बराबर बैठे पंडित कृपाशंकर ने बहुत धीरे से कहा, फिर तो पुरस्कार मुझे ही मिलना चाहिए।”
आत्माराम जी चौंक कर बोले, क्या मतलब? पुरस्कार आपको ही क्यों मिलना चाहिए?”
कृपाशंकर जी ने रहस्यमय स्वर में फुसफुसाते हुए कहा, मेहनत तो सभी ने की है पर पार्टीहित में लालाजी को स्वर्ग ले जाने के लिए यमराज को तो मैंने ही भेजा था-दमे के साथ दम निकालने को।”
          आत्माराम का मुँह खुला का खुला रह गया।
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