शनिवार, 12 अक्टूबर 2013

पूजा का विधान: कितना कर्मकांड और कितना विज्ञान (भाग-एक)



कई बार आप परेशान हो जाते होंगे कि हमारे पूजा पाठ अथवा पूजा पद्धति के साथ इतने सारे कर्मकांड जुड़े हुए हैं, इतने सारे विधान रखे गए हैं, अब पूजा करें या इन्हें पूरा करें। जगह जगह अनेक देवी देवताओं की पूजा के लिए तरह-तरह के विधि विधान किए गए हैं, उदाहरण के लिए गायत्री माता को गुड़हल का फूल पसंद है, शंकर जी को बेलपत्र अत्यन्त प्रिय है, तुलसी विष्णुप्रिया हैं। आखिर ये सब है क्या? कभी आपने सोचा कि हवन में आम की लकड़ी का ही प्रयोग क्यों होता है, पंचपल्लवों में पीपल और वट जैसे वृक्ष ही क्यों शामिल हैं, अन्य क्यों नहीं। खड़ाऊं लकड़ी की और आसन कुशा का ही क्यों होना चाहिए। पूजा का जल या वह जल जो मंदिरों में प्रसाद के साथ चरणामृत के रूप में वितरित होता है, वह तांबे के बर्तन में ही क्यों रखा जाता है। उसमें भी तुलसीदल क्यों? प्रश्न और संदेह बहुत सारे हैं लेकिन सही और तार्किक उत्तर संभवत: आसानी से नहीं मिलता। हम ये सब इसलिए करते हैं क्योंकि ऐसा करने का विधान है और इसलिए ऐसा करना चाहिए। बुजुर्गों और ऋषि मुनियों ने हमसे ऐसा करने का कहा और लिखा है, इसलिए ऐसा करना चाहिए। पर क्या आपने कभी यह सोचा कि ऐसा क्यों करना चाहिए और हमारे ऋषियों-मुनियों ने हमसे ऐसा करने के लिए क्यों कहा? क्यों उन्होंने इस प्रकार के विधि-विधान किए? क्यों उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि ऐसा हर हाल में किया ही जाना चाहिए अन्यथा पूजा अधूरी है। ईश्वर पूर्णतः प्रसन्न नहीं होंगे। नमन कीजिए अपने ऋषियों मुनियों को जिन्होंने कहने को तो आपको पूजा पाठ का विधान दिया और तमाम तरह के कर्मकांड निर्धारित किए। पर आपने यह बात शायद कभी नहीं सोची होगी कि हमारे ऋषि-मुनि कितने बड़े वैज्ञानिक थे। जिन बातों को विज्ञान आज ढूंढ रहा है या सत्य सिद्ध कर रहा है, उन्होंने उसकी व्यवस्था आज से हजारों साल पहले कर दी थी और उस विज्ञान को आपके पूजा पाठ से जोड़ दिया था ताकि बिना पढ़ा लिखा अनपढ़ व्यक्ति भी अनायास उसका लाभ उठा सके। हमारे मनीषी जानते थे कि बिना पढ़े लिखे या कम पढ़े लिखे व्यक्तियों को विज्ञान समझाया नहीं जा सकता लेकिन विज्ञान उनके जीवन में लाया जा सकता है, इसलिए उन्होंने सारे विज्ञान को पूजा पाठ, अध्यात्म और दिनप्रतिदिन के कर्मकांड से जोड़ दिया ताकि व्यक्ति पूजा के बहाने ही सही विज्ञान और प्रकृति (जो स्वयं ईश्वर का ही प्रतिरूप है) के सारे लाभ उठा सके। इससे उसकी अध्यात्मिकता तो बढ़ेगी ही, ईश्वर के प्रति उसका समर्पण बढ़ेगा और साथ ही उसे समस्त मानसिक, शारीरिक और अध्यात्मिक लाभ अनायास प्राप्त हो जाएंगे। आइए आज इसके अध्यात्मिक और वैज्ञानिक पक्ष को जानने की कोशिश करते हैं। इन तथ्यों की प्रामाणिकता सिद्ध करने के लिए इन पंक्तियों के लेखक ने यथासंभव उनके स्रोत का भी उल्लेख करने का प्रयास किया है जहाँ वे प्रमुखता से प्रकाशित, मुद्रित हुए या सामने आए। आइए सबसे पहले यह जान लेते हैं कि पूजा कहाँ करनी चाहिए।

पूजा का स्थान कहाँ होना चाहिए
      "शिवमहापुराण" की विद्येश्वर संहिता में कहा गया है कि यज्ञ (जप एवं पूजा) यदि अपने घर को शुद्ध करके वहीं किया जाए तो उसका फल साधारण ही होता है। गोशाला में करने पर उससे दस गुना शुभ फल मिलता है। इससे भी दस गुना फल किसी जलाशय के किनारे जप-यज्ञ करने पर होता है। जिस जगह पीपल, बेल और तुलसी के वृक्ष हों, उस स्थान पर पूजा करने से जलाशय के तट से भी दस गुना फल मिलता है। मंदिर में उससे भी दस गुना, तीर्थस्थान पर मंदिर से दस गुना, नदी के किनारे उससे भी दस गुना। तीर्थस्थान की नदी के किनारे किए हुए पूजा कार्यों का फल सामान्य नदी के किनारे से दस गुना होता है। सप्तगंगा नामक नदियों के तीर्थ पर जप-यज्ञ का फल भी दस गुना होता है। गंगा, गोदावरी, कावेरी, ताप्ती, सिंधु, सरयू और नर्मदा को सप्तगंगा कहते हैं। समुद्र के किनारे पर सप्तगंगा से भी दस गुना और पर्वत की चोटी पर किए गए पूजा कार्य का फल समुद्र-तट से भी दस गुना होता हैं। लेकिन अंत में भगवान शंकर पार्वती जी से कहते हैं कि सबसे अधिक महत्व का वह स्थान होता है, जहाँ मन लग जाए। अब यह मन कहा लगता है? वहाँ जहाँ आप नियमित रूप से रोज पूजन करते हैं यानि आपका अपना पूजनस्थल और पूजा का आसन।

कुशा का आसन ही क्यों
     पूजा के लिए कुशा के आसन का विधान किया गया है और पूजा के स्थान तक या मंदिर के अंदर तक खड़ाऊं के प्रयोग की तो अनुमति है। किसी और तरह की चप्पल या जूते का प्रयोग आप नहीं कर सकते। आखिर क्यों? जब हम पूजा अर्चना करते हैं तो शरीर में एक विशेष प्रकार की ऊर्जा उत्पन्न होती है जिसे आप विद्युत तरंग भी कह सकते हैं और यही जीवनदायिनी शक्ति है। यदि आप विज्ञान के विद्यार्थी रहे हैं तो आपको पता होगा कि पृथ्वी और जल-ये दोनों ऊर्जा या विद्युत के सुचालक हैं यानि बड़ी तेजी से विद्युत को अपने भीतर खींच लेते हैं। इसी वजह से इन दोनों में करंट भी बहुत तेज लगता है जबकि लकड़ी ऊर्जा का सबसे बड़ा कुचालक है अर्थात वह ऊर्जा को स्थानांतरित नहीं होने देती। यही कारण है कि मंदिर में कुशा के आसन (जो लकड़ी का ही एक प्रकार है) और खड़ाऊं का प्रयोग किया जाता है ताकि आपके शरीर में उत्पन्न हुई ऊर्जा धरती में न समाकर आपके शरीर में ही बनी रहे और आपको अनेक प्रकार के स्वास्थ्य एवं अन्य लाभ दे।

जौ का प्रयोग
     जिस समय अखंड नवरात्र पूजन या पुरश्चरण आदि के लिए कलश स्थापना की जाती है तो मिट्टी के एक सकोरे (बर्तन) में मिट्टी भरकर उसमें जौ बोए जाते हैं और फिर उस पर कलश की स्थापना की जाती है। यहाँ भी देखिए विज्ञान काम फिर कर रहा है। यह सदियों पुरानी व्यवस्था है और आज वैज्ञानिक यह पता लगाने में कुछ हद तक सफल हुए हैं कि जौ की महत्ता क्या है। 18 अगस्त, 2010 के दैनिक हिंदुस्तानमें छपी खबर के मुताबिक, जौ का सेवन करने वाले व्यक्तियों का रक्तचाप अन्य लोगों की तुलना में कम अथवा सामान्य रहता है। डॉक्टर कारिण रेड की अगुवाई में एक अंतर्राष्ट्रीय दल ने एडीलेड विश्वविद्यालय में अनुसंधान किया और पाया कि जौ के छिलके उच्च रक्तचाप के इलाज में मदद कर सकते हैं। मैटूरिटास जर्नल में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार, कच्चा या पकाया हुआ जौ नहीं बल्कि पके हुए जौ का छिलका ब्लड प्रैशर से बहुत ही कारगर तरीके से लड़ता है। 12 सप्ताह के परीक्षण में दल ने 50 लोगों को शामिल किया और पाया कि जिन्होंने पके हुए जौ के छिलकों को खाया, उनका ब्लड प्रैशर औरों के मुकाबले कम हुआ।

पंचगव्य का प्रयोग/गोबर के वैज्ञानिक तथ्य
     गोमूत्र चिकित्सा एवं अनुसंधान केन्द्र, के श्री वीरेन्द्र कुमार जैन ने प्रैस एनक्लेव, दिल्ली से प्रकाशित ’विश्व हिंदी दर्शन‘ पत्रिका में प्रकाशित अपने एक लेख में लिखा है कि गोमाता चलता-फिरता चिकित्सालय एवं औषधियों का भण्डार हैं। गोमूत्र चिकित्सा पद्धति से घर पर ही अनेक असाध्य रोग का इलाज किया जा सकता है। पंचगव्य में रोगों को ठीक करने की अद्भुत क्षमता है। चरक संहिता, रानिघंटु, वृद्धवाग् भटट्, अमृतसागर में वर्णन आया है कि गोमूत्र कड़क, चरका, कसैला, तीक्ष्ण, उष्ण, पंचरस युक्त है। यह पवित्र, विषनाशक, जीवाणुनाशक, त्रिदोषनाशक, तान्त्रिक, मेघाशक्तिवर्द्धक, शीघ्रपाचक, परम रसायन, आनंद एवं बल-बुद्धि प्रदान करने वाला है। यह आयुप्रदाता, रक्त के समस्त विकारों तथा कफ, वात और पित्तजन्य तीन दोषों, हदयरोग व विष के प्रभाव को दूर करने वाला है। सुश्रुत संहिता में लिखा है कि गोमूत्र शूल, गुल्म, उदर, अनाह कुण्डु, ,खुजली, मुखरोगनाशक है। यह किलास, कुष्ठ, आमबस्ति तथा नेत्ररोग नाशक है। इससे अतिसार, वायु के सब विकार, काँस, शोथ, उदर रोग, कीटाणुनाशक, पाण्डु, श्वास, मलावरोध, कामला बिल्कुल ठीक होते हैं। भावप्रकाश में वर्णन है कि गोमूत्र लघु अग्नि दीपक, मस्तिष्क के ज्ञान-तंतुओं को बढ़ाने वाला है। इससे पेट में दर्द, वायुगोला, पेट के अन्य रोग, नेत्ररोग, मुख के सभी रोग, सफेद दाग, रक्त विकार, सभी कुछ ठीक होते हैं। गोमूत्र पीलिया, रक्त की कमी, दस्त लगना, सभी कीटाणु नष्ट करता है। लीवर तिल्ली, सूजना, बवासीर, कान में डालने से कान के रोग नष्ट होते हैं। आखिर गोमूत्र में क्या है जो 5 हजार तरह की बीमारियों से छुटकारा दिला सकता है। परीक्षण में पाया गया है कि इसमें नाईट्रोजन, सल्फर, फास्फेट, सोडियम, पोटेशियम, मैग्नीज, कार्बनिक एसिड, आयरन, सिलीकान, क्लोरिन, मैग्नेशियम, साइट्रिक एसिड, टाट्रिक् एसिड, कैल्शियम, साल्ट, विटामिन ए,बी,सी,डी,ई, मिनरल्स, लेक्टोज, एन्जाइम्स, जल, हिप्यूरिक एसिड, क्रिएटिनिन, स्वर्ण क्षार आदि होते हैं। मनुष्य के शरीर में जल तत्व मौजूद हैं उनमें कमी या अधिकता होने पर ही अधिकांश बीमारियाँ होती हैं। अतः इन तत्वों से युक्त प्राकृतिक दवाई यानि गोमूत्र का सेवन शरीर में जिन तत्वों के अधिकता या कमी होती है उसे संतुलित करके असाध्य रोगों को ठीक कर देता है। कैंसर के मरीजों के लिए गोमूत्र एवं गोबररस एक उत्तम प्रकार की कीमोथेरेपी है, जिसका कोई साइडइफेक्ट नहीं है। गोमूत्र खराब नहीं ह¨ता, किन्तु इसे काँच अथवा मिट्टी के बर्तन में रखना चाहिए फ्रिज में नहीं। गर्भवती गाय का मूत्र बछड़े को जन्म देने के 15 दिन पहले और बाद में छोड़कर बाकी समय में उपयोग किया जा सकता है। यह गंगाजल की तरह से पवित्र है।

2 टिप्‍पणियां:

  1. विजय कुमार, हिंदी अनुवादक, हृद् तंत्रिका केन्‍द्र, एम्‍स13 नवंबर 2013 को 1:25 am बजे

    धन्‍यवाद सर, आपने इस लेख में बहुत ही ज्ञानवर्धक तथ्‍य दिए गए हैं। पढ़कर बहुत ही प्रसन्‍नता हुई । धन्‍यवाद ।

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  2. आपकी टिप्पणी के लिए धन्यवाद। आगे भी आपको इसी तरह की जानकारियाँ देता रहूंगा।

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