मंगलवार, 8 अक्टूबर 2013

क्या आपने भी नवरात्र के व्रत रखे हैं?

पिछले शनिवार से नवरात्र के व्रत शुरु हो गए हैं। उम्मीद है आपने भी आठों या नौ के नौ दिन के लिए व्रत रखे होंगे। अष्टमी या नवमी का व्रत तो जरुर रखेंगे। उम्मीद है कि आपने व्रत का खाना भी खाना शुरु कर दिया होगा। मुझे सबसे ज्यादा तरस बेचारे आलू पर आ रहा है। जिस आलू को एक व्यक्ति एक सप्ताह में आधा किलो के हिसाब से खाता था, उसे आजकल प्रतिदिन एक किलो प्रतिव्यक्ति के हिसाब से डकारा जा रहा है। पीछे पीछे कुटू के आटे की पकौड़ियाँ आ जाती हैं या फिर मखाने की खीर। लौकी की खीर भी उतनी ही डिमांड में है। भुने हुए मखाने खाने का मज़ा तो कुछ और ही है। टाटा का नमक तो बेचारा सौतेला हो गया है पर सेंधा नमक के पहाड़ तो एक के बाद एक ढह रहे हैं। रोजाना की तुलना में दोगुना डालो तब कहीं जाकर नमक का स्वाद आता है। हरी मिर्ची पर भी काफी हॉट हो गई है। भुना जीरा ऊपर से पड़ जाए तो कहने ही क्या। रोज चार-पाँच सेब, केले और दूसरे फलों को तो मैं इसमें जोड़ ही नहीं रहा हूँ। भाईसाहब, घबराइए मत, मैं खाने का नहीं व्रत के तुच्छ से फलाहारी भोजन का जिक्र कर रहा हूँ। हम सब आजकल व्रती हैं और पेट की आँतें बेचारी परेशान है-मेरा व्रत क्यों नहीं हुआ। इससे मुझे क्या लाभ हुआ आखिर। मुझे तो और दिनों की तुलना में कई गुनी मेहनत करनी पड़ रही है। साहब बेचारे व्रत पर हैं, मेमसाहब भी व्रती हैं पर पेट का दु:खड़ा सुनने को कोई तैयार नहीं। भैयाजी, ये व्रत है चरत। पूरे दिन चरते जा रहे हैं और तुर्रा यह कि हम व्रती हैं। शायद व्रत या उपवास का वास्तविक अर्थ हम समझते ही नहीं। व्रत या उपवास का अर्थ है-इंद्रियों पर संयम, भोजन में संयम, शयन में संयम। इंद्रियाँ भी मशीनों की तरह हैं, सचमुच उपवास रखें तो इन इंद्रियों को कुछ आराम मिले और मन भीतर की ओर केंद्रित हो। शरीर के साथ-साथ आत्मा की ओवरहालिंग भी हो जाए। चटपटे मसालों को जीभ कुछ दिन के लिए त्याग दे तो एक दूसरी दुनिया का स्वाद मिले।

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