25 अप्रैल, 2012 अभी अभी इंदिरा गाँधी सांस्कृतिक केंद्र के सभागार से लौटा हूँ। लेकिन मन अब भी मॉरीशस में भारत के उच्चायुक्त महामहिम श्री सीताराम के सानिध्य में चाय की चुस्कियों के बीच पढ़ी गई कविताओं में अटका है। पूर्णिमा जी के नवगीत और ग़ज़ल के साथ शुरु हुई शाम पर कविताओं का ऐसा सुरूर चढ़ा कि हर कोई उसमें डूबता चला गया। बालेंदु जी की कंप्यूटरी कविताओं ने अलग ही समां बांधा। मुझे पता ही नहीं चला कि कब मेरा नाम पुकारा गया और मैंने अपनी चर्चित रचना “चेहरे”पढ़नी शुरु कर दी। सोचा था कि नवगीत पढूंगा लेकिन बात मुखौटों की चल रही थी,इसलिए चेहरे वाली रचना पढ़नी शुरु कर दी। एक बार शुरु हुई तो तालियों की ताल ने अंदर के कवि को जाने किस धरातल से किस धरातल पर पहुँचा दिया। चेहरे थे, मुखौटे थे, शब्द थे, व्यंग्य था, तालियाँ थीं, सराहना थी। पाँव धरती पर पहुँचे तो कानों ने सुना, गुलशनसिंह सुखलाल जी कह रहे थे-राजेश जी, कई साथी आपकी इस कविता की प्रति की माँग कर रहे हैं।
कवि की कमजोरी होती है-उसकी सराहना। इसलिए आपके अनुरोध को भला कैसे ठुकरा सकता हूँ। चलिए यहीं आपसे इस कविता को साझा कर लेता हूँ-
“आइए साहिबान,
देखिए मैंने खोल ली है चेहरों की एक दुकान।
यहाँ चेहरे खरीदे और बेचे जाते हैं,
हमारे यहाँ उधार की भी व्यवस्था है,
आप यहाँ सब कुछ बेखौफ उगल सकते हैं
और चाहें तो दिन में दस चेहरे बदल सकते हैं।”
जिस दिन से मेरा ये विज्ञापन छपा है,
सारे शहर में हड़कंप मचा है,
क्योंकि शायद ही कोई ऐसा हो
जिसके पास अपना असली चेहरा बचा है।
इसलिए जिसे देखो जहाँ देखो
मेरी ओर दौड़ रहा है।
वो जिनको है चेहरों की तलाश,
वो जिनको है चेहरों से खराश,
जो एक के पीछे एक चेहरा छुपाए बैठे हैं,
जो कई कई चेहरों पर कब्जा जमाए बैंठे हैं,
जो अपने आप से भी घबराते हैं,
ऐसे ही ग्राहक मेरे पास आते हैं।
जी हाँ, इनका टेस्ट ही कुछ ऐसा है
जो एक बार भी इन चेहरों का स्वाद चख जाते हैं,
यकीन मानिए, वे अपने असली चेहरे तक गिरवीं रख जाते हैं।
मेरा धंधा भी बड़ा अजीब है,
इससे चेहरा लेता हूँ, उसको चेहरा देता हूँ
मगर मैं किसी को नहीं बताता,
किससे चेहरा लिया है,
किसको चेहरा दिया है,
यही कारण है कि यदि कोई ग्राहक
अपने असली चेहरे में भी मेरे पास आ जाता है
तो उसे उधार लिया हुआ
नकली चेहरा ही समझा जाता है।
मैं सबको देखता और परखता हूँ
मगर सबकी गोपनीयता बरकरार रखता हूँ।
अब तक के इस धंधे में मैंने इतना तो जाना
आज के दौर का हर आदमी एक चरमराता विश्वास है
और किसी न किसी स्तर पर
हर आदमी को एक अदद चेहरे की तलाश है।
चेहरा दर चेहरा ऐसी फसल बो गया है
आज हर आदमी बदशक्ल हो गया है।
मैंने खोली थी ये दुकान
ताकि देख सकूं चेहरों के पीछे चेहरे,
ताकि जान सकूं संबंधों की गहराई,
ताकि माप सकूं प्यार की असलियत,
मगर ये क्या से क्या देखा
हर आदमी एक मुखौटा देखा।
मैं भी कहाँ बच सका श्रीमान,
अहसास के सीने तक पर छाले हो गए हैं
और कोयले की दलाली में दोस्त,
मेरे भी हाथ काले हो गए हैं।
इन नकली चेहरों को खरीदने बेचने में
मैं इतना व्यस्त हो गया
कि इन्हीं नकली चेहरों के बीच
मेरा असली चेहरा ही खो गया।
अभी-अभी कल तक तो था यहीं,
देखिए कहीं आपके पास तो नहीं।
मैंने आपको इतने चेहरे, इतनी सूरतें, इतनी पहचानें दी हैं
तो मुझ पर बस इतनी सी कृपा कीजिए,
सड़क पर, कबाड़ी की दुकान पर, किसी गोदाम में,
यदि कहीं पड़ा मिले-मेरा चेहरा मुझे लौटा दीजिए,
मेरा चेहरा मुझे लौटा दीजिए।
उम्मीद करता हूँ कि आपके दिलों तक पहुँची ये दास्तान देर तक आपको गुदगुदाएगी।
-राजेश श्रीवास्तव (srivastavarajesh2001@yahoo.com)
कविता तो लाजवाब थी ही, खूब रंग जमा। आशा है आपने तस्वीरें अपलोड की होंगी। आपकी फेसबुक प्रोफाइल भी मेरे पास नहीं है। लिंक भेजेंगे तो जोड़ सकूँगी।
जवाब देंहटाएंधन्यवाद पूर्णिमा जी, आपकी ग़ज़ल भी कुछ कम नहीं थी। उसने भी समां बाँध दिया था-खासकर आपके छोटे-छोटे कमेंट्स के साथ। फेसबुक पर तस्वीरें आपको जल्दी ही मिल जाएंगी।
जवाब देंहटाएंआपकी यह रचना मैने फेसबुक पर शेयर की है -- नरेंद्र पाल सिंह,बेंगलुरु
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