मॉरीशस से लौटे हुए करीब दो सप्ताह हो गए हैं लेकिन मन अभी भी क्वाते बोर्न (Quatre Borne) की चहल-पहल भरी सड़क और खूबसूरत नजारों के आसपास ही मंडरा रहा है। अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी में हिस्सा लेने के लिए हमारे मॉरीशस स्थित हाईकमीशन ने हमें होटल गोल्ड रेस्ट में ठहराया था जहाँ बहुत कुछ भारत जैसा ही था। सुबह उठते ही पिछली खिड़की से सूर्य भगवान की उजली किरणें सीधे सीने पर दस्तक देती हैं और अलसायी आँखों को खुलने पर मजबूर कर देती हैं। सामने से दिखाई पड़ती पर्वत श्रृंखलाएं,उनके आसपास शैतान बच्चों की तरह उछलते-कूदते बादलों के कुछ टुकड़े,हरे-भरे पेड़,पेड़ों के बीच बीच बने अद्भुत खूबसूरत मकान,पर्वत श्रृंखलाओं के बीच कहीं गुम होती काली नागिन-सी पतली सर्पाकार सड़क और बीच-बीच में कुछ गगनचुंबी इमारतें—आँखें तो जैसे झपकना ही भूल गई हैं। लगभग हर सुबह हल्की सी बारिश होती है और तन-मन-आँगन सब को भिगो कर चली जाती है। तब भीगा-भीगा अलसाया प्रभात मानों अंगड़ाई लेकर उठता है और सारी निगाहें बस उसी के वश में हो जाती हैं। ये मन जो कहीं टिकता ही नहीं था,वो इन नज़ारों में जहाँ टिक जाता है,वहाँ से हटना ही नहीं चाहता। ये मेरे मन की ध्यानावस्था है या मॉरीशस का सम्मोहक सौंदर्य—मैं अभी तक समझ नहीं पा रहा हूँ।
(होटल की खिड़की से झाँकता मॉरीशस का प्रभातकाल)
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होटल के सामने सड़क पर आते ही एक ओर होटल गोल्ड नेक्स्ट और तंदूरी एक्सप्रैस हैं जिनका आनंद हम उठा चुके हैं तो दूसरी ओर इंडियन रेस्टोरेंट और साउथ इंडियन रेस्टोरेंट हैं जिसके दक्षिण भारतीय व्यंजनों के लाजबाव जायके ने हमें बरबस ही वाह कहने को और दोबारा वहाँ जाने को मजबूर कर दिया था। यही वह सड़क है जिसपर से होकर हम हर रोज गुजरे, सेमीनार में भाग लेने के लिए राजीव गाँधी साइंस सेंटर पहुँचे और लौटकर शाम को फिर वहीं आ गए। लगभग पूरा मॉरीशस घूम लिया लेकिन मन अभी भरा नहीं। कभी पोर्ट लुईस से होकर पोर्ट तक जाता है तो कभी सी-बीच से होकर गंगा तालाब तक पहुँचता है। कभी पतली और चिकनी घुमावदार सड़कों पर फिसलता है तो कभी समुद्र की लहरों पर तैरता हुआ दूर तक चला जाता है।
(होटल गोल्ड रेस्ट के सामने से गुजरती सड़क का एक नजारा)
ये क्षण सचमुच बड़े अमूल्य थे। भारत से लगभग छह हजार किलोमीटर दूर हिंद महासागर के बीचोंबीच बसे इस मॉरीशस द्वीप का आकर्षण वाकई लाजबाव है। ये हर किसी को बरबस अपनी ओर खींच लेता है। इस सुबह की खूबसूरती पर अपनी ही एक कविता याद आ रही है जिनकी पंक्तियाँ कुछ इस तरह हैं-
ढलती बूढ़ी शाम
कर निशा को प्रणाम
जोड़ गई कुछ संदर्भ सुबह के नाम।
नवेली धूप छलकाती रूप छल-छल
कुँवारी कली की हुईं आँखें सजल
कोहरा ले बाँहों में मनचला भोर
लिख गया धरती के सीने पर ग़ज़ल।
ऊंघती उषा-तरुणी को हो गया जुकाम,
जोड़ गई कुछ संदर्भ सुबह के नाम।ले बाल-विधवा- सा निश्छल धवल रूप
चली ठुमकती सुबह की सुनहरी धूप
दूधिया आंचल के नवनीत-वक्ष को
चुपके से कोंच गया मस्त गगन-भूप
हवा फिर हल्के-से छेड़ गयी कलाम,
जोड़ गई कुछ संदर्भ सुबह के नाम।
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