बुधवार, 25 अप्रैल 2012

मॉरीशस के राजीव गाँधी साइंस सेंटर से..

25 मार्च, 2012 मॉरीशस के राजीव गाँधी साइंस सेंटर में बैठा हूँ और बालेंदु शर्मा दाधीच जी के निर्देशन में बने अपने इस पहले ब्लॉग में दो शब्द कहने की तैयारी कर रहा हूँ। विश्व हिंदी सचिवालय द्वारा आयोजित अंतर्राष्ट्रीय सेमीनार और कार्यशाला में हिस्सा लेने के लिए यहाँ पहली बार आने का अवसर मिला है। जीवन में अक्सर ऐसा हो जाता है जो कभी सोचा भी नहीं होता। कभी नहीं सोचा था कि मॉरीशस की भूमि के दर्शन कर सकूंगा और यहाँ बसे भारत के अतीत को अपनी आँखों से देख सकूंगा। अपनेपन की सोंधी सोंधी हवा मेरे नथुनों से टकरा रही है और मुझे एक क्षण को भी नहीं लगा कि मैं भारत से बाहर आ गया हूँ। सब कुछ वैसा ही तो है।
          न जाने कितनी बार मैंने कविताकोश की कविताओं को पढ़ा और संजोया होगा लेकिन इसके संस्थापक ललित कुमार से कभी मुलाकात होगी,कभी सोचा न था। प्रभासाक्षी को तो अक्सर ही पढ़ता रहा हूँ लेकिन किसने कल्पना की थी कि इसके संपादक बालेंदु दाधिच जी से न केवल मुलाकात होगी बल्कि पूरा एक सप्ताह उनके सानिध्य में रहने को मिलेगा। कितने ही अनुभव बाँटने को मिलेंगे। इन अभिव्यक्तियों के बीच एक और भी सुखद अनुभूति हुई-वह थी पूर्णिमा बर्मन जी से मुलाकात। वह अभिव्यक्ति नामक ऑनलाइन पत्रिका के माध्यम से नवगीतों की पाठशाला चलाती हैं और मेरा कवि जीवन नवगीतों से ही आरंभ हुआ है, एक नवगीत संग्रह भी काफी पहले प्रकाशित हो चुका है। लेकिन उन नवगीतों को इंटरनेट पर साझा करने का कभी अवसर सामने नहीं आया पर अब लगता है कि जैसे ये सपना भी साकार होने जा रहा है। उम्मीद करता हूँ कि अपने ब्लॉग के अलावा पहला ऑनलाइन नवगीत उनकी पत्रिका में ही प्रकाशित होगा। मॉरीशस के इस सम्मेलन को नमन जिसने एक सेतु बनकर तमाम साहित्यकारों, कवियों, हिंदीप्रेमियों को एक सशक्त मंच पर खड़ा कर दिया जहाँ से राहें मंजिल की ओर ही जाती हैं। आज इतनी ही।

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