मंगलवार, 31 मई 2016

डाकोर का रणछोड़ मंदिर


डाकोर का रणछोड़ मंदिर


अहमदाबाद (गुजरात) के करीब 100 किलोमीटर दूर डाकोर में स्थित है एक ऐतिहासिक मंदिर जिसे रणछोड़ मंदिर के नाम से जाना जाता है, हालांकि मूल रूप से लोग इसे डाकोर मंदिर नाम से ही जानते हैं। माना जाता है कि डाकोर शहर में स्थित इस मंदिर को 1722 ईस्वी में बनवाया गया था। इसकी गिनती हिंदुओं के पवित्र तीर्थस्थानों में की जाती है। मुख्य हाइवे से होकर जाने में यहाँ 2 से 3 घंटे का समय लगता है। मंदिर की स्थापना के साथ कई कथाएं जुड़ी हैं। इनमें से एक कथा तो यह है कि भगवान श्रीकृष्ण और जरासंध के बीच भीषण युद्ध हुआ था। तब श्रीकृष्ण अपने अनुचरों की प्राणरक्षा के लिए युद्ध छोड़कर भाग गए थे और उन्होंने यहाँ शरण ली थी। इस अनुश्रुति के कारण इस मंदिर का नाम रणछोड़जी पड़ गया। वे जानबूझ कर रण छोड़ कर भागे थे ताकि मथुरा की प्रजा को नरसंहार से बचाया जा सके।

       (रणछोड़ मंदिर के द्वार पर)
भगवान श्रीकृष्ण की लीला को समझ पाना आम इनसान के बस में नहीं है। यदि आप द्वापर में उनकी लीला को देखें तो कहीं वे गुरु की भूमिका में नजर आते हैं, कहीं सखा, कहीं भाई की भूमिका में और अपनी प्रजा को बचाना पड़ जाए तो रणछोड़जी की भूमिका में भी। यह मंदिर उनकी रणछोड़ वाली भूमिका का ही साक्षी है। इस वर्ष अप्रैल में मुझे वहाँ जाने का पुन: सौभाग्य प्राप्त हुआ। इससे पहले करीब 10 वर्ष पूर्व वर्ष 2006 में संसदीय राजभाषा समिति के साथ दर्शन करने का सुअवसर प्राप्त हुआ था। इस बार जैसे ही अहमदाबाद पहुँचा तो सबसे पहले जुबान पर भगवान का रणछोड़ मंदिर ही आया। जो इच्छा करिहौं मन माहीं, हरि प्रताप कछु दुर्लभ नाहीं का सार्थक करते हुए ईश्वर कृपा से वहाँ जाने की तुरंत व्यवस्था हो गई।
                                         (रणछोड़ मंदिर)
(रणछोड़ मंदिर)
मंदिर की ओर जाते हुए मार्ग में अहमदाबाद के ही एक सहयोगी ने मंदिर के बारे में एक और दिलचस्प कथा सुनाई। यह कथा भी बहुत प्रामाणिक लगी क्योंकि जो कुछ कथा में था, वह सब कुछ रणछोड़ मंदिर में और उसके आसपास है। यह कथा इस प्रकार है- भगवान कृष्ण का एक भक्त था वोडाणा। वह प्रतिवर्ष डाकोर से पैदल चलकर द्वारका में द्वारकाधीश भगवान श्रीकृष्ण के दर्शन के लिए जाता था। जब उसकी उम्र बढ़ी तो पैदल जाना मुश्किल हो गया, तब उसने मन ही मन भगवान से आज्ञा लेकर बैलगाड़ी पर जाना आरंभ कर दिया। लेकिन एक समय ऐसा भी आया जब उसके लिए बैलगाड़ी पर बैठकर जाना भी असंभव हो गया। सड़क मार्ग से डाकोर से द्वारका की दूरी लगभग 500 किलोमीटर है। आप जरा कल्पना कीजिए कि वोडाणा के लिए कितना कठिन रहा होगा यह सफर लेकिन भक्ति में वह शक्ति होती है जो सब कुछ करा देती है। हर कष्ट को झेलने की शक्ति दे देती है। भक्त हर कष्ट झेलने को तैयार रहता है लेकिन उम्र और शरीर आड़े आ जाते हैं। वोडाणा के साथ भी शायद यही हुआ। अब उसके लिए न तो इतनी दूर चल पाना संभव था, न ही बैलगाड़ी में जाना। अपनी अक्षमता देखकर भक्त का हृदय रो पड़ा कि अब भगवान के दर्शन कैसे होंगे। भक्त रोए, मन से रोए और भगवान न पिघलें, ऐसा हो नहीं सकता। वोडाणा के साथ भी ऐसा ही हुआ।
अपने भक्त की हालत देखकर द्वारकाधीश भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं डाकोर में प्रकट होने का निर्णय लिया। ऐसी मान्यता है कि भगवान डाकोर में प्रकट हुए तो द्वारका से भगवान श्रीकृष्ण की मूर्ति अदृश्य हो गई। पंडितों में हड़कंप मच गया और उधर डाकोर में उल्लास की लहर दौड़ गई। वोडाणा गदगद था। द्वारका के पंडितों को जब इस घटना का पता चला तो वे भगवान की मूर्ति लेने डाकोर आ पहुँचे। वोडाणा रोने लगा, तत्कालीन राजा ने भी उसका समर्थन किया तो पंडितों ने कहा कि यदि वोडाणा भगवान की मूर्ति के बराबर स्वर्ण दान कर दे तो वे मूर्ति को यहीं छोड़ जाएंगे और मूर्ति की स्थापना डाकोर में ही हो जाएगी। पुरोहितों ने यह चाल जानबूझ कर चली थी क्योंकि उन्हें पता था कि गरीब वोडाणा ऐसा कर नहीं पाएगा और वे अपने ठाकुर जी को दोबारा द्वारका ले जाएंगे।

(वह दुत)
एक तुला (तराजू) की व्यवस्था कर दी गई और एक तुला पर भगवान को रख दिया गया। वोडाणा अपने घर पहुँचा, पत्नी से बात की तो उसने अपने पास मौजूद एकमात्र आभूषण-कान की बाली को उतार कर वोडाणा को दे दिया। जब वह उसे लेकर पहुँचा तो बहुत से लोग हँसने लगे लेकिन उसने किसी की परवाह न करते हुए, दूसरी तुला पर पत्नी की कान की बाली को रख दिया। भगवान की कृपा देखिए, वे अपने भक्त की लाज रखने के लिए उस बाली से ही तुल गए। उनका वज़न उस कानी की बाली के बराबर ही हो गया और द्वारका के पंडित उस मूर्ति को अपने साथ नहीं ले जा सके। द्वारकाधीश भगवान श्रीकृष्ण की मूर्ति की स्थापना डाकोर में ही हो गई और यही मंदिर आज रणछोड़ मंदिर नाम से भी जाना जाता है। मंदिर के ठीक सामने इसी घटना को दर्शाने वाला एक छोटा सा मंदिर है जिसमें एक तुला लगी हुई है।
गोमती जलाशय के किनारे इस मंदिर का निर्माण सफेद संगमरमर से किया गया है। ऊपरी गुंबद में स्वर्ण का आवरण चढ़ाया गया है। भगवान श्रीकृष्ण का बेहद खूबसूरत विग्रह यहाँ विराजमान है। इसे श्याम रंग के पत्थर से बनाया गया है। भक्तों के लिए रणछोड़ मंदिर का महत्व वैसा ही है, जैसा द्वारिका स्थित द्वारिकाधीश मंदिर का। मंदिर प्रतिदिन प्रात: 6 से 12 बजे और सायं 4 से 7 बजे तक खुला रहता है।
(रणछोड़ मंदिर में भगवान के पधारने का वर्णन)

हम मंदिर पहुँचे तो बहुत कम भीड़ थी और हमने जीभर कर भगवान श्रीकृष्ण के मनमोहक स्वरूप के दर्शन किए। एक बार नहीं कई बार दर्शन किए। फिर भी दिल नहीं भरा तो बराबर में माता लक्ष्मी के दर्शन करके एक बार और दर्शन किए। लक्ष्मी माता के मंदिर के करीब ही एक छोटी सी गली में भक्त वोडाणा का घर है जिसे अब मंदिर में ही बदल दिया गया है और वहाँ भी छोटे से विग्रह के रूप में भगवान श्रीकृष्ण को स्थापित कर दिया गया है। आप कभी जाएं तो उस भक्त के घर के दर्शन भी अवश्य कीजिएगा जिसकी भक्ति के कारण द्वारिकाधीश भगवान कृष्ण वहाँ प्रकट हुए। 

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