मॉरीशस में आखिरी दिन और रोती हुई चट्टानें
मॉरीशस प्रवास के आखिरी दिन,भारत की फ्लाइट लेने से पहले पूरा एक दिन हमारे पास था। एक रात पहले ही हमने तय कर लिया था कि जितना भी हो सकेगा,आखिरी दिन मॉरीशस की खूबसरती को अपने मन के कैनवस और कैमरे की स्मृतियों में उतार लेंगे। हम लोग सबसे पहले विश्व हिंदी सचिवालय की महासचिव श्रीमती पूनम जुनेजा जी के आवास पर गए जहाँ वे हमारा इंतजार कर रही थीं। मैंने उनके साथ भारत में रहते हुए लगभाग चार साल तक काम किया है,इसलिए माहौल में कोई अजनबीपन नहीं था। हम बेतकल्लुफ होकर बातें कर रहे थे। बातों-बातो में श्रीमती जुनेजा ने सुझाव दिया कि क्यों न ग्री ग्री (GRIS GRIS) यानि वीपिंग रॉक्स की ओर चला जाए।
नाम बड़ा अजीब और अनोखा- सा लगा। वास्तव में अद्भुत-सा नाम है-वीपिंग रॉक्स यानि रोती हुई चट्टानें। एक बार को यह सोचकर ही रोमांच होने लगता है कि क्या सचमुच कोई चट्टान रो भी सकती है। रोती भी है तो क्या उसका रोना सुनाई देता या सिर्फ आँसू ही दिखाई देते हैं। फिर मन में सवाल उठा कि ये भी मॉरीशस के स्टोन बॉय जैसी कोई कथा तो नहीं है या फिर शायद यही हकीकत हो। ये सारी बातें सोचसोच कर रोमांच और बढ़ता चला गया। दरअसल मॉरीशस में एक समुद्री किनारे का नाम है-GRIS GRIS और यहीं हैं रोती हुई चट्टानें। अगर हम यहाँ न गए होते तो शायद एक बहुत सुंदर अवसर हाथ से चला जाता। यह वह स्थान है जहाँ चट्टानें रोती भी हैं और नहीं भी। वे आँसू भी बहाती हैं और शोर भी करती हैं। ये बात सच भी है और सच नहीं भी।
असल में ये कुछ ऐसी चट्टानें हैं जो एकदम समुद्र के किनारे पर हैं, इनमें भी दो खास ऐसी चट्टानें है जो रोती हैं। उनके करीब खड़ा होना अपने आप में बहुत रोमांचकारी है। इन चट्टानों के कथित आँसू कई बार आपके कपड़ों से भी आकर टकरा जाते हैं। हवा के झोंके इतने तेज होते हैं कि लगता है मानों हवा हमें उड़ा ले जाने को बेताब हो। वह नहीं चाहती कि हम वहाँ खड़े हों।
| (Near Weeping Rocks) |
होता दरअसल ये है कि समुद्र की तीव्र गति से आती हुई लहरें तेजी से इन चट्टानों से टकराती हैं और इनके बीच के खाली पड़े स्थान से होकर ऊपर की ओर तेजी से उछलती हैं। इन लहरों का पानी चट्टानों पर आकर गिरता है और जब वापस नीचे समुद्र की ओर जाता है तो चट्टानों पर सिर्फ कुछ झाग और पानी की बूंदें रह जाती हैं। ये झाग और पानी अगली लहर आने तक धीरे-धीरे टप-टप करके नीचे को टपकता है और ऐसा महसूस होता है कि मानों ये चट्टानें रो रही हैं। ये रोना कोई सच्चाई नहीं बल्कि एक प्रकार का भ्रम या इल्यूजन है। चट्टानें रोती नहीं हैं लेकिन रोती हुई-सी लगती हैं। बहुत ही खूबसूरत नजारा है ये। मन करता है कि यहीं रम जाएं,यहीं बस जाएं और कुदरत के इस करिश्मे को बस रात-दिन यूं ही निहारते रहें-अपलक और अनवरत।
(illusion of Weeping Rocks)
यहीं पर एक “प्रार्थना करती नन” जैसी एक चट्टान है। सचमुच बड़ा ही रमणीय स्थान है। एकदम क्षितिज को मानों छूता हुआ समुद्र एक गोलाकार नीले इंद्रधनुष-सा दिखाई पड़ता है। लहरें जब आकर चट्टानों से टकराती हैं तो ये सोचकर आनंद के साथ-साथ एक अंजाना-सा भय भी मन में समा जाता है कि जब ये लहरें अपने संपूर्ण प्रचंड स्वरूप में होती होंगी तो कितना तलहका मचाती होंगी। इनकी दहाड़ सुनकर मन किसी कोने में दुबक जाता होगा। सन् 1888 को यहाँ आने वाले कवि पॉल जीन टाउलेट (Paul Jean Toulet) ने भी इस स्थान को भय से भरने वाला और भयाक्रांत कर देने वाला पाया और एक कविता लिखी जो यहाँ पर दिए गए एक शिलालेख पर इस प्रकार दर्ज है-
“Sweet beaches where my soul was born
And thous blooming Savanne
Soaked by the tears of the ocean
And the blazing sun.
सप्ताह भर के मॉरीशस प्रवास के दौरान हम सब यानि पूर्णिमा बर्मन जी, उनके पति प्रवीण जी, बालेंदु जी और ललित कुमार जी, काला जी साथ-साथ रहे-सुबह से लेकर शाम तक लेकिन इस मौके पर पूर्णिमा जी, उनके पति और ललित जी हमारे साथ नहीं थे। वे कहीं अन्यत्र व्यस्त थे। केवल बालेंदु जी थे हमारे साथ। मुझे आज भी लगता है कि यदि उन्होंने पहले इस स्थान का भ्रमण नहीं किया है तो निश्चित रूप से उन्होंने ऐसा खो दिया है जो लंबे समय तक उनकी की स्मृतियों में बना रहता। स्मृति के इन सुनहरे क्षणों को मैं उनके साथ और अपने सभी मित्रों के साथ साझा करना चाहता हूँ।
| (On the shore of GRIS GRIS Beach) |
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