शनिवार, 18 अप्रैल 2020

    न जाने दुनिया किस दौर में पहुँच गई है जहाँ न तो कोई अपनापन है, न कोई संवेदना, न कोई तड़प और न किसी के लिए कोई भाव। लगता है जैसे गर व्यक्ति बस अपने लिए जी रहा है। समय और हालात का गिद्ध हर किसी पर अपनी नज़र गड़ाए हुए है। इसी के मद्देनज़र मेरी एक छंदमुक्त रचना।
           हरे रामा हरे कृष्णा हरे हरे

सावधानी हटी, दुर्घटना घटी
बम फटा-अनेक घायल, अनेक मरे
पर गिद्धों की टोली कहे-
हरे रामा, हरे कृष्णा, कृष्णा कृष्णा हरे हरे।
हमें क्या फ़र्क पड़ता है, कोई जिए या कोई मरे,
हरे रामा, हरे कृष्णा, कृष्णा कृष्णा हरे हरे।

कुछ डरते हैं, कुछ मरते हैं
विलाप केवल परिजन करते हैं,
दिल तक जाने के रास्ते सारे अवरुद्ध हैं
वैसे भी हम परायों की मौत पर रोने के विरुद्ध हैं
देश के कर्णधारों का मुँह परंपरागत रूप से लटका है
मीडिया का कैमरा
लाशों की गिनती और मुआवज़े की राशि पर अटका है।

सब कुछ सामान्य है
हर मुर्दे को यह बात मान्य है
मुझे समझ नहीं आता, सब कुछ इतना असामान्य होते हुए
हम इतने सामान्य क्यूँ हैं,
होठों पर ताला डाले गणमान्य क्यूँ हैं
किसी का खून क्यों नहीं खौलता
कोई गुस्से से क्यों नहीं बोलता
हर तरफ भ्रम है, छलावा है
कुछ मरे हैं, कुछ के जिंदा होने का दिखावा है।

अगर कहीं कोई जिंदा होता
कोई आँख तो रोती, कोई मशाल तो जलती
दिल के किसी मकान में
संवेदना की कोई खिड़की तो खुलती
लेकिन सब शांत हैं, अँधरे अब नहीं अखरते
क्योंकि मुर्दे प्रतिक्रिया नहीं करते।

आँखों में जब रेगिस्तान भर गए हों
तड़प, स्पंदन और अहसास मर गए हों
तब क्या फर्क पड़ता है
कौन बेशर्म है, कौन शर्मिन्दा है
कौन मर गया और कौन जिन्दा है।

संवेदनहीनता ने मौत के घाट
उतार डाला है पूरा एक देश,
कोई दुर्भाग्य से बच गया हो
तो उसके लिए गिद्धों का यह संदेश-
कृपया वह भी मुर्दों की जमात में
शामिल होने का कष्ट करे
और प्रेम से गाए-
हरे रामा, हरे कृष्णा, कृष्णा कृष्णा हरे हरे।

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