काफी समय पहले गुरुकृपा से मुझे गुरुपादुकास्तोत्रम् के पठन, चिंतन और मनन का अवसर प्राप्त हुआ और माँ सरस्वती की कृपा से मैंने इसका काव्यानुवाद भी किया। आज इसे आपके सम्मुख ला रहा हूँ-पहले मूल गुरुपादुकास्तोत्रम् संस्कृत में और फिर इसका मेरे द्वारा किया गया हिंदी काव्यानुवाद।
गुरुपादुकास्तोत्रम्
अनंत संसार समुद्र तार नौकायिताभ्यां गुरुभक्तिदाभ्यां।
वैराग्य साम्राज्यद पूजनाभ्यां
नमो नमः श्री गुरु पादुकाभ्यां॥१॥
कवित्व वाराशि निशाकराभ्यां
दौर्भाग्यदावांबुदमालिक्याभ्यां।
दूरीकृतानम्र विपत्तिताभ्यां नमो नमः श्री गुरु पादुकाभ्यां॥२॥
नता ययोः श्रीपतितां समीयुः कदाचिदप्याशु दरिद्रवर्याः।
मूकाश्च वाचसपतितां हि ताभ्यां
नमो नमः श्री गुरु पादुकाभ्यां॥३॥
नाली कनी काशपदाहृताभ्यां
नानाविमोहादिनिवारिकाभ्यां।
नमज्जनाभीष्टततिब्रदाभ्यां नमो नमः श्री गुरु पादुकाभ्यां॥४॥
नृपालिमौलि ब्रज रत्न कांति सरिद्विराज्झषकन्यकाभ्यां।
नृपत्वदाभ्यां नतलोकपंक्ते: नमो नमः श्री गुरु पादुकाभ्यां॥५॥
पापांधकारार्क परंपराभ्यां पापत्रयाहीन्द्र खगेश्वराभ्यां।
जाड्याब्धि संशोषण वाड्वाभ्यां
नमो नमः श्री गुरु पादुकाभ्यां॥६॥
शमादिषट्क प्रदवैभवाभ्यां समाधि
दान व्रत दीक्षिताभ्यां।
रमाधवांघ्रि स्थिरभक्तिदाभ्यां
नमो नमः श्री गुरु पादुकाभ्यां॥७॥
स्वार्चा पराणामखिलेष्टदाभ्यां
स्वाहासहायाक्ष धुरंधराभ्यां।
स्वान्ताच्छ भावप्रदपूजनाभ्यां
नमो नमः श्री गुरु पादुकाभ्यां॥८॥
कामादिसर्प व्रजगारुडाभ्यां विवेक वैराग्य निधि प्रदाभ्यां।
बोध प्रदाभ्यां दृत मोक्ष
दाभ्यां नमो नमः श्री गुरु पादुकाभ्यां॥९॥
गुरुपादुकास्तोत्रम् (हिंदी काव्य रूपांतर)
गुरुभक्ति में जो,नित्य लगन अपार देती हैं,
नौका बनकर भव सागर से तार
देती हैं,
पूजन जिनका वैराग्य का धाम,
उन गुरु पादुकाओं को प्रणाम। (1)
हैं ज्ञान का समंदर,पूनम का ये चाँद धवल
दुर्भाग की आग पर,बरसे कृपा का ये जल
करतीं कष्ट को हरने का काम,
उन गुरु पादुकाओं को प्रणाम। (2)
दरिद्र भले ही क्यूं ना कितना भी हो जाए
सिर जो झुकाए,अतुलित धन सहज ही पा जाए
बोले मूक निशि-दिन आठों याम,
उन गुरु पादुकाओं
को प्रणाम। (3)
पावन चरण, खिल गए मानो पंकज मनोहर
दूर होता मोह माया से,
ये मन निरंतर
शीश झुकाए पूरे हों सब काम,
उन गुरु पादुकाओं
को प्रणाम। (4)
राजमुकुटों सी न्यारी
है, छवि ये अनन्या-सी
सरिता में क्रीड़ा कर रही एक मत्स्य कन्या-सी
जो भी हैं झुके उठते अविराम,
उन गुरु पादुकाओं
को प्रणाम। (5)
इस पाप तिमिर मध्य हज़ारों सूरज-सी दमके
हैं ताप सर्प, ये निगल
जाती हैं गरुण बनके
जड़ता जलधि को जो लेतीं थाम
उन गुरु पादुकाओं
को प्रणाम। (6)
ऐसे शमादि गुण छह ये जीवन में भरती हैं
दान व्रत समाधि में दीक्षा प्रदान करती हैं
हरि चरणों में डूबे
मन-निष्काम,
उन गुरु पादुकाओं को प्रणाम। (7)
सब कुछ मिले, इस जन्म में,जो सेवा में रत है
अन्तर्मन खिले, तभी भाव अगर
अनवरत है
जिसका पूजन दिव्य दे परिणाम,
उन गुरु पादुकाओं को प्रणाम। (8)
कामादि सर्प के लिए, ये गरुण बन जाती हैं
विवेक वैराग्य का, धन विपुल बरसाती हैं,
बोध कराएं दे मोक्ष का धाम,
उन गुरु पादुकाओं को प्रणाम। (9)

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें