रविवार, 27 दिसंबर 2020
मंगलवार, 8 दिसंबर 2020
मंगलवार, 1 दिसंबर 2020
रविवार, 29 नवंबर 2020
शुक्रवार, 25 सितंबर 2020
शनिवार, 19 सितंबर 2020
मंगलवार, 8 सितंबर 2020
शनिवार, 5 सितंबर 2020
सोमवार, 31 अगस्त 2020
शुक्रवार, 28 अगस्त 2020
मंगलवार, 25 अगस्त 2020
रविवार, 23 अगस्त 2020
शुक्रवार, 21 अगस्त 2020
मंगलवार, 18 अगस्त 2020
शनिवार, 15 अगस्त 2020
बुधवार, 12 अगस्त 2020
मंगलवार, 11 अगस्त 2020
शनिवार, 8 अगस्त 2020
शुक्रवार, 7 अगस्त 2020
गुरुवार, 6 अगस्त 2020
मित्रो ! हाल ही में मैंने अपना एक यू-ट्यूब चैनल
शुरु किया है जिस पर आप मेरी कविताएं, नवगीत और ग़ज़लें इत्यादि सुन सकते हैं।
मेरे चैनल का लिंक यह है-
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इसे क्लिक करके आप सीधे मेरे यू-ट्यूब चैनल पर जा सकते हैं और मेरी रचनाओं को सुन सकते हैं। सब्सक्राइब भी करेंगे तो आने वाली रचनाओं के नोटिफिकेशन आपको लगातार मिलते रहेंगे।
बुधवार, 20 मई 2020
दिल तक नहीं जातीं
जो सदाएं दिल तक नहीं जातीं
वो कभी मंजिल तक
नहीं जातीं।
देख आई हैं जो सागर
गहरा
लहरें वो साहिल तक नहीं जातीं।
लोग मिलते हैं
हाथ मिलते हैं
बात लेकिन दिल तक नहीं जाती।
उम्रभर रहता फिर
यकीं तेरा
बातें जो महफिल तक नहीं जातीं।
शायद नहीं है
तड़प वो इनमें,
अब सदाएं दिल तक नहीं जातीं।
दर्द दिखलाता नहीं हूँ
बन गई है आदत ही ऐसी दर्द दिखलाता
नहीं हूँ
मुहब्बत तो बहुत करता हूँ मैं, पर
जताता नहीं हूँ।
कभी दिल पे लगे तो जी भरके रो लेना
बेहतर है
छुपाने को दर्द अपना जबरन मुस्कुराता
नहीं हूँ।
सुना है ये दर्द में दिल को बहुत
चैन सुकून देती
नशा तुझ-सा न हो बोतल में,तो मुँह
लगाता नहीं हूँ।
सजाकर मैं रखूंगा पलकों पर तुझे
जीवनभर मगर
गिराकर
दूसरों को अगर गिरे मैं तब उठाता नहीं हूँ।
आदमी थक गया
जिंदगी भर आदमी चलकर इतना थक गया
गैरों के कंधे पर तभी श्मशान तक गया।
दम निकलते ही पराए हो गए हैं सभी
रस्सियों से बाँधा किसी ने कोई मुँह ढक गया।
ओढ़ कर क़फ़न सिर्फ यही कहता है आदमी
सो लेने दो चैन से अब मैं बहुत थक गया।
एक न एक दिनतो टपकना ही होता है इसे
ये बुढ़ापा ऐसा फल है जो खूब पक गया।
कानों तक आवाज उनके जाती क्यों नहीं
बाप बूढ़ा रातभर खाँसकर थक थक गया ।
रविवार, 3 मई 2020
हाथों की रेखाएं (कहानी)
उसकी डबडबायी आँखों में तैरते प्रश्नचिह्न त्रिशूल की तरह
सीने में गड़ गए। समीर को लगा जैसे उसने अनुभा की भावनाओं के साथ खिलवाड़ किया था।
दिल के किसी कोने में कसक-सी उठी। एक तीखी हूक ने उसे कुछ सोचने पर विवश कर दिया। “क्या प्यार इसी को कहते हैं कि दिल में
ज़रा-सा दर्द हुआ नहीं और धधकते सीने में धड़कनों का ज्वार शुरु। नहीं..शायद
नहीं..ये तो आकर्षण मात्र है। कितना निश्छल और सात्विक था उसका व्यवहार। मैंने ही
शायद उस अनुराग को आसक्ति समझ लिया। बहुत फ़र्क होता है दोनों में-आसक्ति के तार
तो दोनों तरफ से झनझनाते हैं।” समीर के सीने में विचारों का मंथन लगातार चल रहा था।
लेकिन मन
बड़ा स्वार्थी और कुतर्की होता है। हमेशा अपने पक्ष में ही तर्क-वितर्क करता है।
अपनी ग़लतियों की भी अपने ही पक्ष में तर्कसंगत व्याख्या करता है। समीर का मन भी
तो यही कर रहा था। वह सोच रहा था, “अनुभूति, आग्रह, अनुराग, आसक्ति और अनुभा-ये सब एक ही भाव के
अनुभाव-से लगते हैं। वैसे भी ये सारे वर्ण समधर्मी ही तो हैं। क्या इतना ही काफी
नहीं है अनुभा तक पहुँचने के लिए? मुझे देखकर उसकी अनायास झुकती पलकें, ढुलकता
पल्लू, ‘अमिय हलाहल रसभरी’ आँखों में ‘श्वेत श्याम रतनार’ लज्जा, चुन्नी के किसी कोने को
चुपके-से लपेटती हुई नुकीली अंगुलियाँ-क्या ये सब किसी अनकही प्रीत के कोमल कथानक
के पर्याप्त साक्षी नहीं हैं?” अनुरागी मन के सारे तर्क जब अपने पक्ष में होने लग
जाते हैं तो कौंधते प्रश्न और कसक भरी चुभन समाप्त हो जाती है और दिल के दरिया में
बस रग-रग को झनझना देने वाली लहरियाँ उठने लगती हैं। समीर का मन अब कुछ-कुछ शांत
हो गया था।
अनुभा से
उसकी पहली मुलाकात बड़ी दिलचस्प थी। अनुभा आकाशवाणी के “चर्चित चेहरे” कार्यक्रम को कम्पेयर कर रही थी।
उस दिन उस कार्यक्रम में काव्य के क्षितिज पर बहुत तेजी से उभरते कवि और
साहित्यकार समीर को चर्चित प्रतिभा के तौर पर आमंत्रित किया गया था। कार्यक्रम की
रिकॉर्डिंग के दौरान आकर्षण के अदृश्य तार दोनों तरफ से झनझनाए तो ज़रूर थे। साक्षात्कार
में अनुभा की रसभरी आवाज़ और समीर की बेबाक टिप्पणियाँ बहुत दिनों तक लोगों की
ज़ुबान पर रही थीं। इंटरव्यू करते हुए अनुभा ने उससे पूछा था, “समीर जी, इतनी छोटी-सी उम्र में इतनी लोकप्रियता का क्या राज़ है?”
“ईर्ष्या, जलन, निंदा, आलोचना और कभी-कभी
तिरस्कार।,” समीर ने तपाक से कहा तो अनुभा हैरान रह गई। उसने उतने ही
हैरानी भरे स्वर में पूछा, “मैं आपकी बात का अर्थ समझी नहीं, ज़रा
खुलासा कीजिए।”
समीर ने सहज भाव से कहा, “अनुभा जी, आदमी की ये फितरत है कि जब उसे महसूस होता है कि आप उसके सामने
ही पले बढ़े हैं, उसके बराबर हैं लेकिन तेजी से आगे निकले जा रहे हैं और सफलताएं
आपके कदम चूम रही हैं तो उससे बर्दाश्त नहीं होता। परिणाम होता है- ईर्ष्या, जलन,
निंदा, आलोचना और कभी-कभी तिरस्कार। आज मैं जो कुछ हूँ, इन्हीं की बदौलत हूँ
क्योंकि मैं ऐसी सोच वाले लोगों के बीच से होकर गुज़रा हूँ। सँभलने के पीछे ठोकरों
का अनवरत इतिहास होता है। लोग ठोकरों से घबरा जाते हैं लेकिन मैंने इन्हें अपने संभलने
का संबल बना लिया। लोग आलोचनाओं से भागते हैं लेकिन मैंने इन्हें अपनी सफलता का
श्रृंगार बनाया है। रुकावटें मुझे आगे बढ़ने को प्रेरित करती हैं।”
एक क्षण को अनुभा उसका चेहरा देखती रह गई थी। मंत्रमुग्ध-सी
होकर उसने पूछा था, “ऐसा क्यों होता है समीर कि लोग अपनों द्वारा
ही तिरस्कृत होते हैं।” समीर ने गौर किया कि उसने पहली
बार सिर्फ समीर कहा था, समीर जी नहीं। कानों से ज्यादा दिल को अच्छा लगा। उसने भी उसी
आत्मीयता से फौरन उत्तर दिया,“इसका बड़ा
सहज-सा कारण है अनु।” केवल अनु कहे जाने पर अनुभा भी
चौंकी पर उसके अधरों पर मुस्कुराहट ज्यों की त्यों तैरती रही। समीर ने बड़ी बेबाकी
से कहना जारी रखा, “दरअसल ये इंसानी कमज़ोरी है कि जिसे हम नहीं
जानते, उसकी उपलब्धियों और प्रसिद्धि पर प्रसन्न और चकित होते हैं, उसे सराहते हैं
क्योंकि उससे हमारी सेहत पर कोई असर नहीं पड़ता लेकिन जिसे हम जानते हैं और जो
हमें जानता है, उससे हम कन्नी काटने की कोशिश करते हैं क्योंकि अपने ही बीच
पले-बढ़े किसी व्यक्ति का बढ़ना कहीं न कहीं हमारा अपना कद छोटा करता है। हमारे
भीतर हीनता की भावना पैदा करता है। प्रतिस्पर्धी मन इसे स्वीकार नहीं कर पाता।”
अनुभा ने तब पूछा था, “तो ऐसे में आप कैसा दोस्त, हमदर्द या हमसफर
चाहेंगे।” समीर के शरारती मन ने मौका ताड़ा,
उसने झट से चुलबुले अंदाज़ में कहा, “बहुत कुछ आप जैसा ज़हीन-हसीन और कुछ-कुछ नमकीन।” इस पर दोनों ज़ोर से खिलखिलाकर हँस पड़े।
बात मज़ाक की थी लेकिन अनुभा की प्रतिक्रिया ने पहले से
आकर्षणबिद्ध मन को कुछ और भ्रम दे दिए। अब समीर अनुभा से बात करने और मिलने का कोई
न कोई बहाना निकाल लेता। कभी किसी परिचर्चा में, कभी किसी काव्य गोष्ठी में तो कभी
किसी रेस्तराँ में-दोनों की मुलाकात हो ही जाती। हर नई मुलाकात पिछले प्रसंगों को
और तरोताज़ा कर जाती। हर मुलाकात में समीर उसे छेड़ देता, “अभी तक दोस्त, हमदर्द, हमसफर की तलाश में
हूँ अनु।” अनुभा हँसकर टाल जाती लेकिन समीर
का व्यग्र मन बहुत देर तक सब्र नहीं कर पाया। पुरुषोचित अधीरतावश उसने आखिर अपना
प्रणय-निवेदन कर ही डाला। एक बार तो अनुभा हक्की-बक्की रह गई मगर उसने कोई
प्रतिक्रिया नहीं दी। कई बार आग्रह किए जाने पर उसने समीर को जैसे झिड़क दिया, “किसी से हँसकर बोल देने का अर्थ प्यार तो
नहीं होता समीर।” मुरझाया समीर वापस तो चला आया पर
उसका आग्रही मन उससे बार-बार यही पूछता रहा- वो खफ़ा है तो रहे, इतना बता दे मुझको
मेरे आने की ख़बर पाके सँवरता क्यूँ है।
समीर ने तय कर लिया था कि वह अनु को पाकर ही रहेगा। वह हर
बार कोशिश करता, उसे हर बार झिड़कियाँ मिलतीं। लेकिन हर बार झिड़कियों के स्वर में
पहले से ज्यादा मिठास आती गई और आखिरकार एक दिन झिड़की ने प्यार के आगे घुटने टेक
दिए। दो प्यार भरे दिल एक ही बिंदु पर धड़कने लगे। दोस्ती प्रीत के आँगन में
पहुँची और फिर घनिष्ठता विवाह की दहलीज़ छूने लगी। लेकिन समीर मे महसूस किया कि
विवाह की चर्चा आते ही अनुभा अनमनी-सी हो जाती है। इस चर्चा से कतराने लगती है।
उसे लगा, कहीं न कहीं कोई बात ज़रूर है जो अनु को भीतर ही भीतर मथ रही है। उसकी
आँखों में तैरती सैंकड़ों आशंकाएं अकारण नहीं हो सकतीं। इसके लिए उसके मन को मथना
ज़रूरी था, मंथन से ज़रूर कुछ-न-कुछ निकलता है, भले ही विष क्यों न हो।
मन की ग्रंथियाँ आसानी से नहीं खुलतीं लेकिन आप एक बार
व्यक्ति की दु:खती रग को धीरे से सहला दीजिए, उसके दरकते विश्वास और सहमे यकीन को
ज़रा-सा सहारा दे दीजिए, मन के सारे गुबार खुलने लगते हैं। भीतर का उफान बाहर आ
जाता है। अनुभा के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। सिर टिकाने को समीर का कंधा मिला तो ऊपर
से बहुत कड़क और तेज़तर्रार दिखने वाली अनु बिखर गई। मन का मलाल बाहर आ गया, “समीर, अब तुमसे क्या छिपाना...बस संक्षेप
में इतना समझ लो कि मेरे दोनों भाई सिर्फ जोरू के गुलाम निकले। शादी के चंद दिनों
बाद ही बूढ़े माँ-बाप को छोड़कर अपनी पत्नियों के साथ दूसरे शहरों में चले गए। अब
उनकी जिम्मेदारी मेरे कंधों पर है। अब तुम ही बताओ कि अपने जन्मदाताओं को छोड़कर
मैं शादी करके अलग घर कैसे बसा लूँ?” कहते-कहते वह फफक पड़ी थी।
समीर ने धीमे से पूछा, “मगर अनु, आखिर कब तक तुम इस तरह उनका सहारा
बनोगी?”
“उनके जीते जी तो बन ही सकती हूँ।”
“ठीक है, पर उसके बाद तुम्हारा क्या होगा? तुम्हारी
इच्छाओं और तुम्हारे सपनों का क्या होगा? आज तुम विवाह करना नहीं चाहतीं और कल
चाहकर भी शायद न कर सको क्योंकि तब उम्र और समाज आड़े आ जाएंगे। तब किसके सहारे
गुज़ारोगी ये ज़िदगी? तब तक शायद समीर के इस कंधे पर भी शायद तुम्हारा हक न रह
जाए।”
अनुभा
की आँखों से सैलाब बहने लगा था, फिर भी उसने ख़ुद को संभालते हुए कहा, “तुम अपनी जगह ठीक हो समीर, मगर मैं भी ग़लत
नहीं हूँ। अपने माँ-बाप को असहाय कैसे छोड़ दूँ?”
समीर ने उसके चेहरे को दोनों हाथों में लेते हुए कहा, “मैं कब कह रहा हूँ कि उन्हें असहाय छोड़ दो।
अनु, ये सहारा तो तुम विवाह के बाद भी बन सकती हो। मैं कितना कर पाऊंगा ये तो नहीं
जानता लेकिन तुम्हें इतना यकीन ज़रूर दिलाता हूँ कि तुम अपनी कमाई से अपने माँ-बाप
की जीवन भर सेवा करना चाहोगी तो मुझे कोई एतराज़ नहीं होगा।”
अनु के अधीर मन को राहत मिली लेकिन वह अब भी संयत नहीं हो
सकी थी। उसने अटकते हुए स्वर में कहा, “लेकिन मेरे मन में एक और बहुत बड़ी शंका है समीर। तुम सुनोगे
तो कहोगे कि आधुनिक युग की एक लड़की इस तरह की बात कह रही है। मैं आधुनिक समाज में
ज़रूर रह रही हूँ लेकिन रीति-रिवाज़ों को मानने वाले पुरातनपंथी परिवार की लड़की
हूँ।”
“तुम कहना क्या चाहती हो अनु?,” समीर थोड़ा कंफ्यूज़ हो गया था।
“समीर, मैं और मेरा परिवार ज्योतिष में बहुत
विश्वास रखते हैं और एक बहुत पहुँचे हुए ज्योतिषी ने मेरा हाथ देखकर बहुत पहले ही
बता दिया था कि मेरे हाथ में विवाह की रेखा ही नहीं है।”
समीर
खिलखिलाकर हँस पड़ा, “विवाह की रेखा ही नहीं है, तो चलो कोई बात नहीं मैं विवाह करूंगा
तो बन जाएगी।”
अनुभा
ने बीच में ही उसे काटते हुए कहा, “सिर्फ इतना ही नहीं समीर, उन्होंने तो यह भी कहा है कि यदि
मैंने जबरन विवाह की कोशिश की तो मेरे विवाह के कुछ समय पश्चात ही मेरे पति की
मृत्यु हो जाएगी और मैं अपनी आँखों के सामने तुम्हें....।” बह बुरी तरह फफक पड़ी। समीर ने उसके मासूम चेहरे को
हाथों में लेकर कहा, “बस इतनी सी बात जिसमें तुम दुबली हुई जा रही हो, पगली कहीं की।”
“ये इतनी सी बात नहीं है समीर, मेरे माँ-बाप
के अलावा मेरे होने वाले जीवनसाथी के जीवन का भी प्रश्न है। मैं उसका जीवन दाँव पर
नहीं लगा सकती।”
अब
समीर ने गंभीर होकर कहा, “लेकिन अपना जीवन दाँव
पर लगा सकती हो? अनु, मैं तुम्हारी भावनाओं की कद्र करता हूँ। ज्योतिषशास्त्र और
हाथों की रेखाओं पर भी विश्वास करता हूँ। ये रेखाएं बहुत कुछ बोलती हैं लेकिन सब
कुछ नहीं बोलतीं। सब कुछ बोलें भी तो ज़रूरी नहीं कि हम सब कुछ समझ जाएं। अंतिम
सत्य तो सिर्फ विधाता जानता है। हम तो केवल अनुमान लगा सकते हैं। अब उन संभावनाओं
और अनुमानों के लिए जिंदगी की सच्चाइयों से तो मुँह नहीं मोड़ा जा सकता।”
समीर का बोलना जारी था, “ जो हो सकता है-उसके लिए, ‘जो हो रहा है’ या ‘जो होने को
तैयार है’ उसे तो छोड़ा नहीं जा सकता। मान लो तुम्हारे बारे
में ज्योतिषी की गणना ग़लत हुई तो उस दिन किस ज्योतिषी से जाकर अपनी उम्र के
गुज़रे सालों का हिसाब माँगोगी?”
“और गणना सच हुई तो?” अनुभा ने सुबकते हुए कहा।
“मान लो सच हुई तो भी जो होना है वो तो होकर
ही रहेगा, तुम्हारे या मेरे कहने से तो रुकेगा नहीं। तो क्या जो भावी है, उसके
घटने तक हम बैठकर उसका इंतज़ार ही करते रहें? सच तो ये भी है कि एक दिन मरना है,
हर हाल में मरना है तो क्या आज से ही जीना छोड़ दें और मौत की प्रतीक्षा करें?
नहीं, अनु नहीं, अघटित की कल्पना कर लेने से जीवन रुकता नहीं है। अब ये तुम्हारे
हाथ में है कि तुम्हें भविष्य के अंधकार में डूबे भाग्य की अनदेखी रेखाओं के फल की
प्रतीक्षा करनी है या अपने सामने बाँह पसारे अपने वर्तमान का हाथ थामकर आगे बढ़ना
है और अपना भविष्य खुद संवारना है। वर्तमान का हाथ थामो, भविष्य से हम निपट लेंगे।”
अनुभा ने क्षण भर को समीर की तरफ देखा
और फिर एक गहरे निश्चय के साथ उसके बढ़े हुए हाथों को अपने हाथों में थाम लिया।
*****
शनिवार, 18 अप्रैल 2020
शिलान्यास (कहानी)
शिलान्यास
पंडित कृपाशंकर विरोधी खेमे से बिल्कुल सहमत नहीं थे। उनका
कहना था, “कमज़ोरी का दूसरा नाम है दिल। दिल हालांकि
कभी-कभी दीवार की तरह मज़बूत हो सकता है और दीवार दिल की तरह कमज़ोर लेकिन दिमागी
फैसले दिल के स्तर पर नहीं किए जा सकते। आप ठंडे दिमाग से काम लीजिए, भावुकता में
मत बहिए।” इतना कहते-कहते पंडित जी खुद भावुक हो गए, “जिस
आदमी ने अपनी सारी ज़िंदगी गाँव की सेवा में खपा दी हो और जिसने गाँव के हित को ही
अपना हित और अहित को अपना अहित समझा हो, ऐसा आदमी पार्टी और खेमेबंदी से ऊपर होता
है। दूसरों के लिए घर जुटाने वाला ये आदमी आज भी खंडहरनुमा कमरे में रहता है-अकेला
और बीमार। ऐसे महान सेवकराम जी के नाम पर गाँव की मुख्य सड़क का शिलान्यास क्यों
नहीं हो सकता?”
अब विरोधी दल के गौतम जी कहने लगे, “हम मानते हैं पंडिज्जी कि लाला सेवकराम जी
ने इस गाँव की बहुत सेवा की है। उन्होंने एक से बढ़कर एक काम किए हैं, लेकिन
स्वर्गीय कालूप्रसाद जी का योगदान भी तो कुछ कम नहीं। स्वर्गवासी व्यक्ति ज्यादा
वंदनीय और महत्वपूर्ण होता है। ज़िंदों को इस बात का हक नहीं है कि वे अपनी कब्र
खुदने से पहले अपना नाम किसी पत्थर पर खुदवाएं। इससे हमारे कालूप्रसाद जी की आत्मा
को कष्ट पहुँचेगा। कालू जी ने इस गाँव के लिए अपनी जान की कुर्बानी दी है, भले ही
गंभीर रोग में पड़कर दी हो। लेकिन क्या फ़र्क पड़ता है, महापुरुषों की जान
महत्वपूर्ण होती है, जान जाने का कारण नहीं। अब सड़क के नाम का पत्थर लगेगा तो
कालू जी के नाम पर ही वरना उनकी आत्मा को चैन नहीं मिलेगा। उन्हें बड़ा कष्ट होगा
और हम एक मरहूम आत्मा को कष्ट देकर अपमानित नहीं कर सकते।”
पंडित जी ने किचकिचा कर कहा, “उन्हें कष्ट न देने के लिए एक अच्छे-भले जिंदे आदमी को कष्ट
पहुँचा सकते हैं आप?”
“पंडिज्जी, आदमी का जन्म तो कष्ट भोगने के
लिए ही हुआ है। लेकिन कम-से-कम मरने के बाद तो उन्हें सुख-सम्मान देने की कोशिश की
जानी चाहिए। मेरा ख़्याल है कि ये सभा मेरे ख़्याल की हमख़्याल होगी।” इतना कहकर
गौतम जी चुप हो गए तो पंडित कृपाशंकर जी ने तमतमा कर कहा, “अपना
ख़्याल अपने भेजे में रखिए। हमारे लाला जी की उपलब्धियों को यूँ दरकिनार नहीं किया
जा सकता। माना कि वे आज न ज्यादा बोल पाते हैं, न ज्यादा चलते हैं लेकिन उनके
द्वारा किए गए लोकहित के काम हमारे विरोधियों के सीने पर मूंग दलते हैं। उन्होंने
अपनी टांगों की मज़बूती गाँव भर की कमज़ोरी दूर करने के लिए ही खोई है। पहला हक
उन्हीं का बनता है।”
इसके विरोध में एक नौजवान उठ खड़ा हुआ और बोला, “उन्होंने अपने पैर गाँव की कमज़ोरी दूर करने
में नहीं बल्कि एक्सीडेंट में खोए हैं। पंडिज्जी महाराज, कोई सड़क पर आँखें बंद
करके चलेगा तो यही होगा न। और उसी सड़क का नाम आप उनके नाम पर रखकर क्या संदेश देना
चाहते हैं।”
पंडितजी का चेहरा अपमान से
लाल हो गया, “तब तो आप
यह भी कहेंगे कि उन्होंने अपनी आँखों की रोशनी जीवन भर गरीब बच्चों को लालटेन में
पढ़ा कर नहीं खोयी बल्कि वह उनसे अपने आप ही तलाक लेकर चली गई।”
इस पर एक कोने से आवाज़
आई, “अब ये बात हमसे क्यों पूछते हैं, जाकर उनके
मोतियाबिंद से पूछिए।”
मगर पंडित जी अड़े थे, “लाला जी बेहद काबिल हैं।”
कोई ज़ोर से फुसफुसाया, “बिल्कुल जी, बिल्कुल, बेहद काबिल हैं, सिर्फ
देखने, चलने-फिरने, उठने-बैठने और ज्यादा बोलने के ही काबिल नहीं हैं। बाकी तो
बहुत काबिल हैं।”
“उनके हम पर बड़े अहसान हैं।”
किसी ने उठकर कहा, “तो ये बात हमें सुनाकर घर की बात सार्वजनिक
क्यों कर रहे हैं? जाइए और जाकर उनके अहसान उतारिये। यहाँ वक्त क्यों ख़राब कर रहे
हैं?”
पंडित जी तिलमिलाकर बोले, “आप लाला जी का अपमान कर रहे हैं।”
“मगर मैं तो आपसे बातें कर रहा हूँ” पीछे से
फिर आवाज़ आई।
“तो क्या हुआ, अपमान तो लालाजी का ही हुआ ना।
अरे हम छोटों का क्या है, कोई भी नासपीटा कुछ भी कहकर चला जाए पर अपमान तो बड़ों
का ही होता है। हम लालाजी के इस अपमान को बर्दाश्त नहीं करेंगे।”
इतना सुनने पर बीड़ी जले
दाँतों वाले एक सज्जन ने अपनी तमाम छेद वाली धोती सँभालते हुए कहा, “बर्दाश्त तो आपसे अपनी पहली बीबी भी नहीं
हुई थी पंडिज्जी। तभी उसे छोड़कर दूसरा ब्याह रचाने को डांय डांय मारे मारे फिर
रहे हो।”
पंडित जी चीखकर बोले, “सभा में व्यक्तिगत मामले मत उठाइए।”
“सही बात है, इससे सार्वजनिक अपमान होता है,”
किसी ने बड़े ज़ोर से कहा।
दूसरे ने कहा, “चलिए इस बारे में आपके घर आकर एकांत में बात
करेंगे। कोई औरत निगाह में है क्या?”
सारी सभा हँस-हँस कर
लोटपोट हो गई। खीजे और खिसियाए हुए पंडित जी झेंपपर बैठ गए। उनके बैठते ही कालू जी
की पार्टी के लालसिंह मेहता खड़े हुए। उनके उठते ही सभा में पचासों आदमी भी उठ
खड़े हुए और सभा छोड़कर चल दिए। लालसिंह ने पान की पीक को तेजी से सटकते हुए कहा, “अरे भाईलोग आप कहाँ चल दिए?” इस पर जाते
हुओं में से एक ने घूमकर कहा, “आपको सुनने से अच्छा है कि घर
जाकर बीबी की मनहूस शक्ल देख लें।”
नहले पर दहला जड़ते हुए
लालसिंह ने कहा, “पर क्या भाभी जी भी इस वक्त आपकी इस वाहियात सूरत को देखना चाहेंगी? शाम
तो ढलने दें।”
“अरे पसंद करे या न करे, देखनी तो पड़ेगी ही,
कानूनी बाध्यता है।”
“तो फिर जाइए, घर जाकर कानून का गैर-कानूनी
इस्तेमाल कीजिए।” कहकर लालसिंह ने खीसें निपोर दीं। सारे लोग एकबार फिर ठठाकर हँस
पड़े। ठहाके कुछ कम हुए तो लालसिंह ने कहा, “अच्छा अब अपनी
बत्तीसी बंद करो और.....”
इससे पहले कि वे वाक्य
पूरा कर पाते, एक बुजुर्ग बोले, “अरे भईया, अब बतीसी किस के पास रह गई है, दो चार दाँत से ही काम चला रहे
हैं। सामने वालों से हँसते हैँ और पीछे वालों से खाते हैं।”
लालसिंह ने तुनककर कहा, “मैं आपकी नहीं बल्कि उनकी बात कर रहा था
जिनकी बत्तीसी अभी सलामत है। आप तो बंद करने की बजाय अपना थोबड़ा खुला ही रखिए, दो
चार मक्खियों को गर्मी से थोड़ी राहत मिल जाएगी।”
बुजुर्ग का मुँह बंद हो
गया लेकिन बाकी लोगों के दाँत फट पड़े। छींटाकशी कम हुई तो लालसिंह ने गंभीर होकर
कहा, “अच्छा अब मज़ाक छोड़िए और मेरे कुछ सवालों
का पार्टी और दलगत खेमेबंदी से उठकर जबाव दीजिए।”
कुछ लोग कुर्सियाँ छोड़ कर
उठने लगे तो लालसिंह बोले, “मैंने खेमेबंदी से ऊपर उठने को कहा है, कुर्सियों से नहीं। अच्छा बताइए,
ज्यादा पूजनीय कौन होता है छोटा या बड़ा?”
आवाज़ें आईं, “बड़ा, बशर्ते छोटों की जान वेवज़ह न खाता
हो।”
“सच्चाई जीवन है या मृत्यु?” लालसिंह ने
दूसरा सवाल दागा।
सभा चिल्लाई, “मृत्यु बशर्ते जीते जी न आए।”
“माला किस पर चढ़नी चाहिए-जिंदे या
स्वर्गवासी पर?”
कुछ नौजवान चिल्लाए, “स्वर्गवासी पर मगर अपवादस्वरूप जिंदे नेताओं
पर भी। एक आपके लिए भी लाए हैं। बताइए कब पहनेंगे अभी या स्वर्गवासी होने पर?”
लालसिंह भन्नाकर बोले, “मैं अपवादों की बात नहीं कर रहा हूँ। मूल
समस्या से मत भटकिए। अच्छा एक बात और बताइए, जो सेवा करे वह बड़ा है या जो ख़ुद को
सेवक कहे वह बड़ा है?”
जोश-जोश में सारी सभा
चिल्ला पड़ी, “जो सेवा
करे वह बड़ा है।”
लालसिंह ने दोगुने जोश में
भरकर कहा, “लो जी, हो
गया फैसला। सड़क का शिलान्यास माननीय सेवकराम जी के नाम पर नहीं बल्कि स्वर्गीय
श्रद्धेय कालूप्रसाद के नाम पर होगा।”
उनके इतना कहते ही सारी सभा में हो हल्ला मच गया। लालसिंह पर बातें
घुमाने-फिराने, लोगों को बेवकूफ बनाने, औरों के मुँह से ग़लत ढंग से अपनी मनपसंद
बात कहलवाने, आम आदमी को राजनीतिक पैंतरेबाज़ी में फँसाने जैसे
आरोपों-प्रत्यारोपों के बीच सभा का सत्रावसान हो गया। उसी रात दमे के रोगी लाला
सेवकराम जी का भी दम घुटने से देहावसान हो गया।
अनेक अंतर्विरोधों के बावजूद अंतिम विदाई पर अन्तत: पूरा गाँव
जुटा। जब उनका अंतिम संस्कार किया जा रहा था तो उस समय उनकी पार्टी के सबसे बड़े
नेता आत्माराम जी ने संपूर्ण गाँववालों की मौजूदगी में सुबकते हुए कहा, “कालू जी के साथ अब तो लाला जी भी नहीं रहे। सब
जानते थे कि उनका योगदान कालू जी से कहीं ज्यादा था पर जाने कितनों को उनके जिंदा
होने का मलाल था। उनकी काली जीभ ने अपना कमाल दिखा दिया। एक रात में ही लाला जी ने
अपना नश्वर शरीर त्याग दिया।” सारी निगाहें लालसिंह पर टिक गईं जिन्होंने कल ही
जिंदा और स्वर्गवासी नेताओं की तुलना की थी।
उधर
आत्माराम जी का सुबकना जारी था, “अब हम सबको भी अपने मतभेद और मनभेद त्याग देने चाहिए। बैर और वैमनस्य
त्याग देना चाहिए। पिछली आत्मा का तो पता नहीं लेकिन कहते हैं कि तुरंत मरने वाली
की आत्मा तेरहवीं होने तक उसके घर के आसपास ही भटकती है। ऐसे में लालाजी की आत्मा
भी हमें देख सुन रही होगी। अब हमें उनकी अदृश्य मौजूदगी में ही गाँव की मुख्य सड़क
का नाम लालाजी के नाम पर कर देना चाहिए।”
बहुत से विरोधी कुछ कहने को आतुर थे लेकिन हालात ने उनकी
जीभों को दाँतों के बीच और जिनके दाँत नहीं थे, उनके मसूड़ों के बीच फँसा दिया। वे
न चाहकर भी चुप रहे। सर्वसहमति न होते हुए भी सर्वसम्मति से बात तय हो गयी। अगले
ही दिन सड़क का शिलान्यास लालाजी के नाम पर कर दिया गया।
लालाजी की इस सामयिक मौत पर विरोधी खेम में दु:ख और पीड़ा के
असामयिक बादल छाए हुए थे। वहीं उनके अपने खेमे में मृत्यु का दर्द कम हर्ष का
माहौल ज्यादा था। सब उनके मरने की टाइमिंग को सलाम कर रहे थे। जीते जी ही नहीं
उन्होंने मरने पर भी पार्टी को सिर उठाने का मौका दे दिया था। आखिर इतने बड़े
मुद्दे पर उनकी पार्टी को सफलता का सेहरा उनकी समसामयिक मौत ने ही पहनाया था। लालाजी
ने सही समय पर महाप्रस्थान करके अपनी पार्टी की सारी मुश्किलों को आसान कर दिया
था। इधर रामधुन चल रही थी, उधर विरोधी सिर धुन रहे थे।
पार्टी कार्यालय में पार्टी कार्यकर्ताओं की बैठक हुई। आत्माराम
जी बार-बार लालाजी के गुण गाते न थकते कि किस तरह उन्होंने जीते जी और मरने के बाद
भी अपनी पार्टी का हित किया। आखिर सड़क का शिलान्यास उन्हीं के नाम पर हुआ और कद
पार्टी का बड़ा हो गया। आत्माराम जी ने कहा, “पार्टी कार्यकर्ताओं ने भी बहुत मेहनत की है। उन्हें इसका
पुरस्कार दिया जाना चाहिए।” इस पर बराबर बैठे पंडित कृपाशंकर ने बहुत धीरे से कहा,
“फिर तो पुरस्कार मुझे ही मिलना चाहिए।”
आत्माराम जी चौंक कर बोले,
“क्या मतलब? पुरस्कार आपको ही क्यों मिलना चाहिए?”
कृपाशंकर जी ने रहस्यमय
स्वर में फुसफुसाते हुए कहा, “मेहनत तो सभी ने की है पर पार्टीहित में लालाजी को स्वर्ग ले जाने के लिए यमराज
को तो मैंने ही भेजा था-दमे के साथ दम निकालने को।”
आत्माराम का मुँह खुला का खुला रह गया।
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हरे रामा हरे कृष्णा हरे हरे
सावधानी हटी, दुर्घटना घटी
बम फटा-अनेक घायल, अनेक मरे
पर गिद्धों की टोली कहे-
हरे रामा, हरे कृष्णा, कृष्णा कृष्णा हरे हरे।
हमें क्या फ़र्क पड़ता है, कोई जिए या कोई मरे,
हरे रामा, हरे कृष्णा, कृष्णा कृष्णा हरे हरे।
कुछ डरते हैं, कुछ मरते हैं
विलाप केवल परिजन करते हैं,
दिल तक जाने के रास्ते सारे अवरुद्ध हैं
वैसे भी हम परायों की मौत पर रोने के विरुद्ध हैं
देश के कर्णधारों का मुँह परंपरागत रूप से लटका है
मीडिया का कैमरा
लाशों की गिनती और मुआवज़े की राशि पर अटका है।
सब कुछ सामान्य है
हर मुर्दे को यह बात मान्य है
मुझे समझ नहीं आता, सब कुछ इतना असामान्य होते हुए
हम इतने सामान्य क्यूँ हैं,
होठों पर ताला डाले गणमान्य क्यूँ हैं
किसी का खून क्यों नहीं खौलता
कोई गुस्से से क्यों नहीं बोलता
हर तरफ भ्रम है, छलावा है
कुछ मरे हैं, कुछ के जिंदा होने का दिखावा है।
अगर कहीं कोई जिंदा होता
कोई आँख तो रोती, कोई मशाल तो जलती
दिल के किसी मकान में
संवेदना की कोई खिड़की तो खुलती
लेकिन सब शांत हैं, अँधरे अब नहीं अखरते
क्योंकि मुर्दे प्रतिक्रिया नहीं करते।
आँखों में जब रेगिस्तान भर गए हों
तड़प, स्पंदन और अहसास मर गए हों
तब क्या फर्क पड़ता है
कौन बेशर्म है, कौन शर्मिन्दा है
कौन मर गया और कौन जिन्दा है।
संवेदनहीनता ने मौत के घाट
उतार डाला है पूरा एक देश,
कोई दुर्भाग्य से बच गया हो
तो उसके लिए गिद्धों का यह संदेश-
कृपया वह भी मुर्दों की जमात में
शामिल होने का कष्ट करे
और प्रेम से गाए-
हरे रामा, हरे कृष्णा, कृष्णा कृष्णा हरे हरे।
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