सोमवार, 22 जून 2015

                          मेरी कुछ ग़ज़लें 
              
              (1)  आदमी कितना थक गया  
                                                                     
जिंदगी भर आदमी चलकर इतना थक गया
गैरों के  कंधे  पर  तभी श्मशान  तक गया।

दम निकलते  ही  पराए हो  गए  हैं  सभी
रस्सियों से बाँधा किसी ने कोई मुँह ढक गया।

ओढ़ कर क़फ़न सिर्फ यही कहता है आदमी
सो लेने दो चैन से अब मैं  बहुत  थक गया।

एक न एक दिनतो टपकना ही होता है इसे
ये  बुढ़ापा ऐसा  फल है  जो खूब  पक गया।

कानों तक  आवाज  उनके जाती  क्यों नहीं
     बाप बूढ़ा रातभर खाँसकर थक  थक गया ।

          (2) कस्तूरी लेकर आया

कभी दरार  तो कभी  दूरी  लेकर आया
यहाँ पर  हर शख्स मजबूरी लेकर आया।

उसे  क्या पता  मृत्यु का  निमंत्रण होगा
अभागा हिरन फकत कस्तूरी लेकर आया।

एक तुम ही थे बस लहुलुहान कहने वाले
मैं  तो  हरेक शाम  सिंदूरी  लेकर आया।

क्या पता  कुमारसंभव  कोई  बन  जाए
हरेक गाथा इसलिए अधूरी लेकर आया।

     (3) बरगदों तक मत जाइए
                                                                            
दूब हैं  तो बरगदों  तक मत जाइए
सामर्थ्य की सरहदों तक मत जाइए।

कसक, टूटन, तड़पन रहे सिर्फ बाकी
संबंधों की उन हदों तक मत जाइए।

जिंदगी से  जूझने  का  रख हौंसला
ग़म भुलाने मयकदों तक मत जाइए।

आदमी  की  खातिर  वक्त  निकालो
आदमी के बस पदों तक मत जाइए।

छाँव दे सकता है बस छोटा पेड़ ही
हुनरमंदों के  कदों तक  मत जाइए।

उस एक सच को जानने की कोशिश करो
मंदिरों या मस्जिदों तक मत जाइए।
       
             (4) दर्द दिखलाता नहीं हूँ
                                                                          
बन गई है  आदत ही ऐसी  दर्द  दिखलाता नहीं हूँ
मुहब्बत तो बहुत करता हूँ मैं, पर जताता नहीं हूँ।

कभी दिल पे लगे  तो जी  भरके रो  लेना बेहतर है
छुपाने को दर्द  अपना  जबरन  मुस्कुराता  नहीं हूँ।

सुना है  ये  दर्द  में  दिल को  बहुत  चैन सुकून  देती
नशा तुझ-सा न हो बोतल में,तो मुँह लगाता नहीं हूँ।

सजाकर मैं रखूंगा पलकों पर तुझे जीवनभर मगर
गिराकर दूसरों को अगर गिरे मैं तब उठाता नहीं हूँ।

        (5)   दर्द गहरा होता है                                                                       
जब  दर्द  कहीं  कोई  बेहद  गहरा होता है
इन मुस्कानों पर भी उसका पहरा होता है।

बाँधों को तोड़े नदिया  अक्सर बरसातों में
पर शांत है समंदर क्योंकि गहरा होता है।

चलना ही जीवन है, चलते जाना राही तुम
सड़ जाता है पानी वो  जो ठहरा होता है।

दिन भर  में जाने  कितने  बदले है आदमी
यूं कहने को तो बस एक ही चेहरा होता है।

सब रोशनियाँ भी तब फीकी फीकी लगती हैं
दिल के मंदिर में जब भी  अन्धेरा होता  है।  
          

     

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