गुरुवार, 25 जून 2015

(मेरी इस रचना को 1995-96 में हिंदी अकादमी, दिल्ली से नवोदित लेखक पुरस्कार प्राप्त हुआ था।)

बेटे की पाती माँ के नाम
क्षमा करना माँ
बहुत दिन हुए शहर आए, तुझे खत न लिख सका।
माँ तू कैसी है?
क्या अब भी गाँव भर में देवी जैसी है?
तू देख लेना माँ-मेरा गाँव एक दिन शहर बनेगा,
मेरा यकीन है,
तेरे बाद एक दिन तेरा मंदिर बनेगा।

मैं भी अब बाबू बन गया हूँ माँ,
अक्सर अपने गाँव की बस पकड़ना चाहता हूँ
पर इस शहर की पकड़ बड़ी जादुई है माँ
चुंबक की तरह पकड़ लेता है।
तू अपने सीने में भींच लेती थी.
ये अपनी खुरदुरी हथेलियों में जकड़ लेता है।

मुझे याद है माँ,
तूने मुझे लेकर पाले थे कुछ सपने,
मगर यहाँ पलती हैं विवशताएं और व्यस्तताएं,
यहाँ की चमचमाती कारें,
गाँव के सोंधे सोंधे सपनों को
कुचलते हुए ऐसे निकल जाती हैं
जैसे बचपन में
बेचारे रमुआ को कुचल गया था
हरिया काका का मरखना बैल।
क्या उस कुचली हुई टांग को
रमुआ आज भी ढोता है माँ?
मुझे याद करके और कौन-कौन रोता है माँ?
  
माँ धनिया अब कैसी है?
कौन-कौन सा साग ससुराल में राँधती होगी,
हर रक्षाबंधन पर अनायास कंपकंपाने लगते हैं हाथ,
पता नहीं अब राखी किसे बाँधती होगी।
और बता माँ, तेरी खाँसी अब कैसी है?
मैं जब भी शहर से आऊंगा,
तेरे लिए अच्छी सी दवाई लाऊंगा।

माँ मेरे कुछ दोस्त, लिखना चाहते हैं एक किताब-
गाँव पर, गाँव के लोगों और उनके भोलेपन पर,
शहर के सठियाए बुढ़ापे और
गाँव में बीते अल्हड़ बचपन पर।
मैं भी उनके साथ शायद आऊंगा
पर बुरा न मानना माँ,
सबसे सामने तुझे माँ नहीं कह पाऊंगा।
तुझे न मिल सकूं तो घबराना मत
और हाँ, मुझे देखकर
सबके सामने रो जाना मत।
उन लोगों से भले ही नहीं कहूंगा,
पर मैं तो तेरा बेटा ही रहूंगा।

इस खत को किसी से पढ़वा लेना माँ
और लौटती डाक से
मेरे घर के पते पर उत्तर देना।
बहू-बच्चे ठीक हैं,
और कहने को नहीं कुछ विशेष,
पायं लागूं माँ, तेरा बेटा गनेश।

माँ की पाती बेटे के नाम
बेटा गनेस, तेरा खत मिला,
तेरी ममताभरी मजबूरियाँ मिलीं
गाँव और सहर के बीच की बढ़ती हुई दूरियाँ मिलीं।
तू मेरी चिंता मत कर बेटा,
आराम से सहर में रह,
अच्छा ओढ़-पहन, कमा-खा,
इन बूढ़ी साँसों का क्या है,
राम जाने कब आ जाए बुलावा।

जब याद भौत सताती है
तो आँसुओं के मोती आँखों में भर लेती हूँ,
और थरथराते सीने पर
चकिया का भारी पत्थर धर लेती हूँ।
एक बात कहूँ बेटा,
इसे सठियाई  सीख समझ मत भुलाना,
अपने बच्चों को तू
कभी बड़ा सहर मत दिखाना।
नहीं तो तेरा सहर भी,
उन्हें गाँव-सा छोटा लगेगा,
फिर तू कब तक और कहाँ तक,
उनके पीछे भगेगा।

तू तो पढ़ा-लिखा है बिटवा,
मुझ अनपढ़ की तरह, पगलाए सपने मत पालना,
बच्चों को सहर में सहर की तरह ही ढालना,
क्योंकि गाँव से पलकर
जो सहर तक जाते हैं,
जिन गलियों में वे खेले थे,
जिस मिट्टी में वे लोटे थे,
वही सब उन्हें पिछड़े और बदबूदार नज़र आते हैं।

अब तो तू नदियाँ देखता होगा,
यहाँ तेरी याद में बिलखते हैं बंबा और नहर,
तेरे बाबू को काल खा गया
और तेरी माँ को तेरा सहर।
बुखार से तो अब लड़ा नहीं जाता,
पर गाहे-बगाहे हर किसी से बिन बात लड़ जाती हूँ,
आँखें भी ऐसी धुंधला गई हैं
कि मक्की की रोटी समझ
अक्सर चूल्हे की आग पकड़ जाती हूँ।

अनपढ़-गँवार निरच्छर हूँ,
मेरी कोई बात बेटा, दिल से न लगाना,
चाहे किसी बहाने ही सही,
तू कुछ दिन को गाँव जरुर आ जाना।
तू घबरा मत बेटा,
कसम खाती हूँ मुरली वाले की
और तू जानता है मैं निभाऊंगी,
मैं तेरी माँ हूँ,
अपने जीते जी तेरे किसी दोस्त को न बताऊंगी।

महरी, मालन, नौकरानी या दूर की रिश्तेदार,
तू जो चाहे कह देना,
पर बेटा, मैंने तेरी पसंद के
देसी घी के लड्डू बना कर रखे हैं,
सहर जाने से पहले, सबकी नज़र बचाकर,

चुपचाप उन्हें रख लेना।

मंगलवार, 23 जून 2015

कसौली जाएं तो हनुमान जी के सिद्ध मंदिर में दर्शन अवश्य करें

          अभी कुछ समय पूर्व रम्य वादियों से घिरे खूबसूरत पहाड़ी स्थल- कसौली जाने का अवसर मिला। चंडीगढ़-शिमला राजमार्ग पर स्थित कसौली चंडीगढ़ से -करीब 70-75 किलोमीटर दूर है और सोलन जिले के अंतर्गत आता है। एक कार्यालय का निरीक्षण करने के सिलसिले में यहाँ पहुंचा तो मौसम बेहद शानदार और खुशगवार था और बादलों की घनी घटाओं ने हमें अपने घेरे में ले लिया था। बादल के टुकड़े बदन को छू-छूकर निकल रहे थे। दूर कहीं एक गीत बज रहा था-ये कौन आया, रोशन हो गई महफिल जिसके नाम से। क्या इसीलिए ये हमें छू-छू कर देख रहे थे? ये कल्पना भी अद्भुत है।
          यहाँ के एयरफोर्स स्टेशन के अंतर्गत आने वाले क्षेत्र का सबसे बड़ा आकर्षण है-हनुमान जी का सिद्ध मंदिर। जहाँ यह मंदिर स्थित है उसे Manky Point  कहा जाता है। संभव है तमाम बंदरों के वहाँ होने के कारण इसका नाम मंकी पॉइंट पड़ा हो और अंग्रेजी में इसे बिगाड़ कर ऐसा कहा जाने लगा हो। हनुमान जी का मंदिर हो और बंदर न हों,ऐसा तो हो ही नहीं सकता। यहाँ तक जाने के लिए लगभग एक हजार सीढ़ियाँ घूम घूम कर चढ़नी पड़ती हैं। तब जाकर मंदिर की दीवारें आरंभ होती हैं और मंदिर के अहाते में बना हेलीपेड नज़र आता है। बुजुर्गों के लिए यह चढ़ाई आसान नहीं है।
          इस स्थान के बारे में मान्यता है कि संजीवनी बूटी लाते समय हनुमान जी का पाँव दो स्थानों पर पहाड़ियों से टकराया। दायां पाँव जहाँ टकराया, वह स्थान शिमला का जाखू है और बायां पाँव जहाँ टकराया, वह कसौली का यही स्थान है। पाँव के आकार की चोटी पर ही यह मंदिर बना हुआ है। मंदिर की ऊँचाई लगभग 7220 फुट है। मंदिर में "लाल देह लाली लसे" वाले हनुमान जी नहीं हैं बल्कि चमचमाते सफेद संगमरमर की दिव्य मूर्ति है जिसका आकर्षण इतना ज्यादा है कि बस आदमी उन्हें निहारता ही रह जाए। साथ में दुर्गा माँ हैं, भगवान भोले हैं, गणेश जी हैं और भगवान विष्णु भी। बजरंगी के दर्शन ने तन-मन की सारी थकान दूर कर दी। हनुमान जी के दर्शन करते-करते नज़र ऊपर को उठी तो देखा कि कपीश्वर के जन्म के बारे में बड़ा बढ़िया श्लोक भी लिखा है। मैंने उसे नोट कर लिया। ये श्लोक इस प्रकार है-
          श्रीकृष्ण चतुर्दश्यां भौमे स्वात्यां कपीश्वर।
          मेषलग्ने अंजनीगर्भात् प्रादूर्भूत स्वय: शिव।।           ("अगस्त्य संहिता")        
(अर्थात मंगलवार श्रीकृष्ण चतुर्दशी के दिन मेष लग्न के साथ अंजनी माता के गर्भ से हनुमान जी के रूप में स्वयं भगवान शिव उत्पन्न हुए)
          चूंकि यह स्थान सामरिक रक्षा की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है, इसलिए किसी भी स्थान की फोटो लेना निषिद्ध ही नहीं है, आप यहाँ कैमरा तो छोड़िए, पेनड्राइव तक नहीं ले जा सकते। इसलिए प्रभु की कोई फोटो तो नहीं ले सका पर कसौली के कुछ चित्र जरूर साथ लाया हूँ।

सोमवार, 22 जून 2015

                          मेरी कुछ ग़ज़लें 
              
              (1)  आदमी कितना थक गया  
                                                                     
जिंदगी भर आदमी चलकर इतना थक गया
गैरों के  कंधे  पर  तभी श्मशान  तक गया।

दम निकलते  ही  पराए हो  गए  हैं  सभी
रस्सियों से बाँधा किसी ने कोई मुँह ढक गया।

ओढ़ कर क़फ़न सिर्फ यही कहता है आदमी
सो लेने दो चैन से अब मैं  बहुत  थक गया।

एक न एक दिनतो टपकना ही होता है इसे
ये  बुढ़ापा ऐसा  फल है  जो खूब  पक गया।

कानों तक  आवाज  उनके जाती  क्यों नहीं
     बाप बूढ़ा रातभर खाँसकर थक  थक गया ।

          (2) कस्तूरी लेकर आया

कभी दरार  तो कभी  दूरी  लेकर आया
यहाँ पर  हर शख्स मजबूरी लेकर आया।

उसे  क्या पता  मृत्यु का  निमंत्रण होगा
अभागा हिरन फकत कस्तूरी लेकर आया।

एक तुम ही थे बस लहुलुहान कहने वाले
मैं  तो  हरेक शाम  सिंदूरी  लेकर आया।

क्या पता  कुमारसंभव  कोई  बन  जाए
हरेक गाथा इसलिए अधूरी लेकर आया।

     (3) बरगदों तक मत जाइए
                                                                            
दूब हैं  तो बरगदों  तक मत जाइए
सामर्थ्य की सरहदों तक मत जाइए।

कसक, टूटन, तड़पन रहे सिर्फ बाकी
संबंधों की उन हदों तक मत जाइए।

जिंदगी से  जूझने  का  रख हौंसला
ग़म भुलाने मयकदों तक मत जाइए।

आदमी  की  खातिर  वक्त  निकालो
आदमी के बस पदों तक मत जाइए।

छाँव दे सकता है बस छोटा पेड़ ही
हुनरमंदों के  कदों तक  मत जाइए।

उस एक सच को जानने की कोशिश करो
मंदिरों या मस्जिदों तक मत जाइए।
       
             (4) दर्द दिखलाता नहीं हूँ
                                                                          
बन गई है  आदत ही ऐसी  दर्द  दिखलाता नहीं हूँ
मुहब्बत तो बहुत करता हूँ मैं, पर जताता नहीं हूँ।

कभी दिल पे लगे  तो जी  भरके रो  लेना बेहतर है
छुपाने को दर्द  अपना  जबरन  मुस्कुराता  नहीं हूँ।

सुना है  ये  दर्द  में  दिल को  बहुत  चैन सुकून  देती
नशा तुझ-सा न हो बोतल में,तो मुँह लगाता नहीं हूँ।

सजाकर मैं रखूंगा पलकों पर तुझे जीवनभर मगर
गिराकर दूसरों को अगर गिरे मैं तब उठाता नहीं हूँ।

        (5)   दर्द गहरा होता है                                                                       
जब  दर्द  कहीं  कोई  बेहद  गहरा होता है
इन मुस्कानों पर भी उसका पहरा होता है।

बाँधों को तोड़े नदिया  अक्सर बरसातों में
पर शांत है समंदर क्योंकि गहरा होता है।

चलना ही जीवन है, चलते जाना राही तुम
सड़ जाता है पानी वो  जो ठहरा होता है।

दिन भर  में जाने  कितने  बदले है आदमी
यूं कहने को तो बस एक ही चेहरा होता है।

सब रोशनियाँ भी तब फीकी फीकी लगती हैं
दिल के मंदिर में जब भी  अन्धेरा होता  है।