(मेरी इस रचना को 1995-96 में
हिंदी अकादमी, दिल्ली से नवोदित लेखक पुरस्कार प्राप्त हुआ था।)
बेटे की पाती
माँ के नाम
क्षमा करना माँ
बहुत दिन हुए शहर आए, तुझे खत न लिख सका।
माँ तू कैसी है?
क्या अब भी गाँव भर में देवी जैसी है?
तू देख लेना माँ-मेरा गाँव एक दिन शहर बनेगा,
मेरा यकीन है,
तेरे बाद एक दिन तेरा मंदिर बनेगा।
मैं भी अब बाबू बन गया हूँ माँ,
अक्सर अपने गाँव की बस पकड़ना चाहता हूँ
पर इस शहर की पकड़ बड़ी जादुई है माँ
चुंबक की तरह पकड़ लेता है।
तू अपने सीने में भींच लेती थी.
ये अपनी खुरदुरी हथेलियों में जकड़ लेता है।
मुझे याद है माँ,
तूने मुझे लेकर पाले थे कुछ सपने,
मगर यहाँ पलती हैं विवशताएं और व्यस्तताएं,
यहाँ की चमचमाती कारें,
गाँव के सोंधे सोंधे सपनों को
कुचलते हुए ऐसे निकल जाती हैं
जैसे बचपन में
बेचारे रमुआ को कुचल गया था
हरिया काका का मरखना बैल।
क्या उस कुचली हुई टांग को
रमुआ आज भी ढोता है माँ?
मुझे याद करके और कौन-कौन रोता है माँ?
माँ धनिया अब कैसी है?
कौन-कौन सा साग ससुराल में राँधती होगी,
हर रक्षाबंधन पर अनायास कंपकंपाने लगते हैं हाथ,
पता नहीं अब राखी किसे बाँधती होगी।
और बता माँ, तेरी खाँसी अब कैसी है?
मैं जब भी शहर से आऊंगा,
तेरे लिए अच्छी सी दवाई लाऊंगा।
माँ मेरे कुछ दोस्त, लिखना चाहते हैं एक किताब-
गाँव पर, गाँव के लोगों और उनके भोलेपन पर,
शहर के सठियाए बुढ़ापे और
गाँव में बीते अल्हड़ बचपन पर।
मैं भी उनके साथ शायद आऊंगा
पर बुरा न मानना माँ,
सबसे सामने तुझे माँ नहीं कह पाऊंगा।
तुझे न मिल सकूं तो घबराना मत
और हाँ, मुझे देखकर
सबके सामने रो जाना मत।
उन लोगों से भले ही नहीं कहूंगा,
पर मैं तो तेरा बेटा ही रहूंगा।
इस खत को किसी से पढ़वा लेना माँ
और लौटती डाक से
मेरे घर के पते पर उत्तर देना।
बहू-बच्चे ठीक हैं,
और कहने को नहीं कुछ विशेष,
पायं लागूं माँ, तेरा बेटा गनेश।
माँ की पाती बेटे
के नाम
बेटा गनेस, तेरा खत मिला,
तेरी ममताभरी मजबूरियाँ मिलीं
गाँव और सहर के बीच की बढ़ती हुई दूरियाँ मिलीं।
तू मेरी चिंता मत कर बेटा,
आराम से सहर में रह,
अच्छा ओढ़-पहन, कमा-खा,
इन बूढ़ी साँसों का क्या है,
राम जाने कब आ जाए बुलावा।
जब याद भौत सताती है
तो आँसुओं के मोती आँखों में भर लेती हूँ,
और थरथराते सीने पर
चकिया का भारी पत्थर धर लेती हूँ।
एक बात कहूँ बेटा,
इसे सठियाई सीख समझ
मत भुलाना,
अपने बच्चों को तू
कभी बड़ा सहर मत दिखाना।
नहीं तो तेरा सहर भी,
उन्हें गाँव-सा छोटा लगेगा,
फिर तू कब तक और कहाँ तक,
उनके पीछे भगेगा।
तू तो पढ़ा-लिखा है बिटवा,
मुझ अनपढ़ की तरह, पगलाए सपने मत पालना,
बच्चों को सहर में सहर की तरह ही ढालना,
क्योंकि गाँव से पलकर
जो सहर तक जाते हैं,
जिन गलियों में वे खेले थे,
जिस मिट्टी में वे लोटे थे,
वही सब उन्हें पिछड़े और बदबूदार नज़र आते हैं।
अब तो तू नदियाँ देखता होगा,
यहाँ तेरी याद में बिलखते हैं बंबा और नहर,
तेरे बाबू को काल खा गया
और तेरी माँ को तेरा सहर।
बुखार से तो अब लड़ा नहीं जाता,
पर गाहे-बगाहे हर किसी से बिन बात लड़ जाती हूँ,
आँखें भी ऐसी धुंधला गई हैं
कि मक्की की रोटी समझ
अक्सर चूल्हे की आग पकड़ जाती हूँ।
अनपढ़-गँवार निरच्छर हूँ,
मेरी कोई बात बेटा, दिल से न लगाना,
चाहे किसी बहाने ही सही,
तू कुछ दिन को गाँव जरुर आ जाना।
तू घबरा मत बेटा,
कसम खाती हूँ मुरली वाले की
और तू जानता है मैं निभाऊंगी,
मैं तेरी माँ हूँ,
अपने जीते जी तेरे किसी दोस्त को न बताऊंगी।
महरी, मालन, नौकरानी या दूर की रिश्तेदार,
तू जो चाहे कह देना,
पर बेटा, मैंने तेरी पसंद के
देसी घी के लड्डू बना कर रखे हैं,
सहर जाने से पहले, सबकी नज़र बचाकर,
चुपचाप उन्हें रख लेना।