कविता नहीं कुरुक्षेत्र
ये शहर
लिज़लिज़ाहट भरे स्पर्शों और
संबंधों का है
ये शहर
अमावस्या में रोशनी तलाशते अंधों
का है।
हो सकता है ये शहर
कुछ न दे आपको-
न सांत्वना, न सहानुभूति
न अपनापन, न मरहम,
लेकिन जख्म न दे, नमक न दे
यह नहीं हो सकता।
पता नहीं दौड़ती हैं गाड़ियाँ या
सड़कें
भागता है आदमी या उम्र,
कटता है वक्त या आदमी स्वयं से
ये सोचने से पहले
इस शहर का हर बच्चा जवान हो जाता
है
और जवानी सोचने के लिए नहीं होती।
अपने बचपन की ओर दौड़ता है
बस्तों के बोझ से
छिल गई हैं मासूम हथेलियाँ
बच्चे अब स्कूलों में नहीं
यातनागृहों में जाते हैं
जहाँ ‘अ’ से अनार, ‘आ’ से आम नहीं
‘अ’ से अज्ञात, ‘आ’ से आतंकवादी
पढ़ाया जाता है।
साँझ ढले जब लौटता है बच्चा
तो चेहरे पर
खेलने की ललक नहीं
दुबकने की दहशत होती है।
गाँधी अब गांडीव हो गया है
कलम की जगह
हाथों में आ गई हैं बंदूकें
अब कविता नहीं, कुरुक्षेत्र लिखा जाता है।
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