जाने क्यूं पिछले कुछ दिनों से सोया हुआ संवेदनशील
प्राणी फिर से कविता की उन्हीं गलियों में लौट जाना चाहता है जिन गलियों को बड़े
शहर की व्यस्तताओं ने लगभग भुला दिया है। मन आज आगे जाने की बजाय पीछे भागने को
तैयार है। हो सकता है-आज कई सारी कविताएं सुना डाले-
एक जिंदा आदमी की मौत
‘आदमी हो या दरिंदा हो
जिंदा रहना ही काफी नहीं
जिंदा रहने का अहसास भी तो जिंदा
हो।‘
मेरे इस वाक्य का अर्थ
जब उनकी दृष्टि से पहचाना गया
तो इसे राष्ट्रद्रोह से भी बड़ा
माना गया
और चूंकि मैंने
वक्त से पहले, मारे जाने के खिलाफ
ज़ेहाद छेड़ी है
इसलिए उनकी भेंगी दृष्टि में
मेरी सोच की ज़मीन जरा टेढ़ी है।
कितना बड़ा अपराधी हूँ मैं
मरने और मारने के इस दौर में,
जिंदा रहने का आदी हूँ मैं
कदाचित इसी से कुछ मुर्दे
घबराने लगे हैं
और उन्हें
एक अभूतपूर्व विद्रोह के आसार
नज़र आने लगे हैं।
नपुंसकों की एक मुर्दा फौज
मेरे खिलाफ
हाथों में बड़े-बड़े विज्ञापन लिए
सीने पर उधार के पोस्टर चिपकाए
पागल कुत्ते की तरह
मुझे मारने पर आमादा है।
इन मुर्दा बस्तियों में,
जिधर देखो, जिधर घूमो
एक ही अफवाह है, एक ही चर्चा है-
देखो तो कैसा कलियुग आ गया है
कितना अजीब वाशिन्दा है
बिना मुर्दों की इजाज़त लिए
एक आदमी जिंदा है।
अफवाह और तेज होगी
दंगा भड़केगा, गोली चलेगी
एक जिंदा आदमी की आहुति देने के
लिए
जाने कितने उसूलों की होली जलेगी।
मेरा ये शरीर मुर्दों की जमात में
लाया ही जाएगा
मैं चीख-चीख कर
अपने जिंदा होने का प्रमाण दूंगा
मगर फिर भी उसे दफनाया ही जाएगा।
अगले दिन,
किसी क्षेत्रीय अखबार के
किसी एक कोने में,
एक छोटी-सी खबर होगी-
‘एक जिंदा आदमी की रहस्यमय मौत।’
कभी न बेअसर जाएगी,
मेरा यकीन है
मेरे राख होने से पहले ही
एक मौत
जाने कितने मुर्दों को जिंदा कर
जाएगी।
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