सोमवार, 15 अप्रैल 2013


कविता नहीं कुरुक्षेत्र
 

ये शहर

लिज़लिज़ाहट भरे स्पर्शों और संबंधों का है

ये शहर

अमावस्या में रोशनी तलाशते अंधों का है।

हो सकता है ये शहर

कुछ न दे आपको-

न सांत्वना, न सहानुभूति

न अपनापन, न मरहम,

लेकिन जख्म न दे, नमक न दे

यह नहीं हो सकता।

 
पता नहीं दौड़ती हैं गाड़ियाँ या सड़कें

भागता है आदमी या उम्र,

कटता है वक्त या आदमी स्वयं से

ये सोचने से पहले

इस शहर का हर बच्चा जवान हो जाता है

और जवानी सोचने के लिए नहीं होती।

 
इसलिए हर कोई

अपने बचपन की ओर दौड़ता है

बस्तों के बोझ से

छिल गई हैं मासूम हथेलियाँ

बच्चे अब स्कूलों में नहीं

यातनागृहों में जाते हैं

जहाँ ‘अ’ से अनार, ‘आ’ से आम नहीं

‘अ’ से अज्ञात, ‘आ’ से आतंकवादी पढ़ाया जाता है।

साँझ ढले जब लौटता है बच्चा

तो चेहरे पर

खेलने की ललक नहीं

दुबकने की दहशत होती है।

गाँधी अब गांडीव हो गया है

कलम की जगह

हाथों में आ गई हैं बंदूकें

अब कविता नहीं, कुरुक्षेत्र लिखा जाता है।

कुछ और कविताएं


          जाने क्यूं पिछले कुछ दिनों से सोया हुआ संवेदनशील प्राणी फिर से कविता की उन्हीं गलियों में लौट जाना चाहता है जिन गलियों को बड़े शहर की व्यस्तताओं ने लगभग भुला दिया है। मन आज आगे जाने की बजाय पीछे भागने को तैयार है। हो सकता है-आज कई सारी कविताएं सुना डाले-
एक जिंदा आदमी की मौत

‘आदमी हो या दरिंदा हो

जिंदा रहना ही काफी नहीं

जिंदा रहने का अहसास भी तो जिंदा हो।‘


मेरे इस वाक्य का अर्थ

जब उनकी दृष्टि से पहचाना गया

तो इसे राष्ट्रद्रोह से भी बड़ा माना गया

और चूंकि मैंने

वक्त से पहले, मारे जाने के खिलाफ

ज़ेहाद छेड़ी है

इसलिए उनकी भेंगी दृष्टि में

मेरी सोच की ज़मीन जरा टेढ़ी है।


कितना बड़ा अपराधी हूँ मैं

मरने और मारने के इस दौर में,

जिंदा रहने का आदी हूँ मैं

कदाचित इसी से कुछ मुर्दे

घबराने लगे हैं

और उन्हें

एक अभूतपूर्व विद्रोह के आसार

नज़र आने लगे हैं।

 
इसीलिए आजकल,

नपुंसकों की एक मुर्दा फौज

मेरे खिलाफ

हाथों में बड़े-बड़े विज्ञापन लिए

सीने पर उधार के पोस्टर चिपकाए

पागल कुत्ते की तरह

मुझे मारने पर आमादा है।

 
टुकड़ा-टुकड़ा साँस लेती

इन  मुर्दा बस्तियों में,

जिधर देखो, जिधर घूमो

एक ही अफवाह है, एक ही चर्चा है-

देखो तो कैसा कलियुग आ गया है

कितना अजीब वाशिन्दा है

बिना मुर्दों की इजाज़त लिए

एक आदमी जिंदा है।

 
जानता हूँ

अफवाह और तेज होगी

दंगा भड़केगा, गोली चलेगी

एक जिंदा आदमी की आहुति देने के लिए

जाने कितने उसूलों की होली जलेगी।

मेरा ये शरीर मुर्दों की जमात में

लाया ही जाएगा

मैं चीख-चीख कर

अपने जिंदा होने का प्रमाण दूंगा

मगर फिर भी उसे दफनाया ही जाएगा।

 
और----

अगले दिन,

किसी क्षेत्रीय अखबार के

किसी एक कोने में,

एक छोटी-सी खबर होगी-

‘एक जिंदा आदमी की रहस्यमय मौत।’

 
किंतु एक जिंदा आदमी की यह मौत

कभी न बेअसर जाएगी,

मेरा यकीन है

मेरे राख होने से पहले ही

एक मौत

जाने कितने मुर्दों को जिंदा कर जाएगी।

सोमवार, 8 अप्रैल 2013

कुछ छंदमुक्त कविताएं

        एक बार फिर से आपके सामने आने पर बड़ी प्रसन्नता महसूस हो रही है। बेहद व्यस्तता के कारण कई महीनों से अपने ब्लॉग पर चाहकर भी कुछ पोस्ट नहीं कर पाया। कभी कार्यालय में व्यस्तता तो कभी देश के कई स्थानों पर राजभाषा सम्मेलनों के आयोजक के रूप में जिम्मेदारी के कारण, वक्त ही नहीं निकाल सका। आज अपनी कुछ पुरानी लोकप्रिय कविताओं को आप सबके साथ बाँटकर भीतर का सृजनशील प्राणी फिर से आपके सामने आना चाहता है:


अंदर का आदमी

कोई नहीं चाहता सुगंधि ढोना
अब अभिशाप है गुलाब होना
क्योंकि व्यवस्था का यह प्रश्न बहुत पुराना है,
पराग,सुगंधि और मकरंद का मतलब
एक-न-एक दिन मसला जाना है

कदाचित इसीलिए हमने
अपने चारों ओर काँटे ही काँटे बो लिए हैं,और अजाने ही,
अनायास ही हम सब नागफनी हो लिए हैं।

यह जो नया विश्लेषण है
यह जो नई रीत है
मेरे अंदर का आदमी, इसी से भयभीत है।
बाहर के आदमी की भीतर के आदमी से
जन्म-जन्मांतर की दुश्मनी है
दोनों में हमेशा ठनी है।

लेकिन आज के समाज की ये कैसी मजबूरी है
बाहर के आदमी को जिंदा रखने की खातिर
अंदर के आदमी की हत्या जरूरी है।

आज के दौर का हर आदमी इस चक्रव्यूह का मारा है
और नैतिकता की परिधि में
आज हर व्यक्ति हत्यारा है,
आप भी हत्यारे हैं, मैं भी हत्यारा हूँ
आप भी शापित हैं, मेरा सर्वस्व भी शर्मिन्दा है
फर्क सिर्फ इतना सा है
आपके बाहर का आदमी बचा है,
मेरे भीतर का आदमी जिंदा है। 
                                                  

  वारदात के बाद 

पहले कहीं किसी बस्ती में
एक खून पर भी मच जाता था तहलका,
खून खौल उठता था सबका,
मगर अब सामूहिक हत्याकांड भी
तहलका तो क्या सनसनी भी पैदा नहीं करता
बीस-तीस लोगों के मरने से पहले मानों कोई नहीं मरता।

हर हत्या के बाद
चीखता है सायरन/ दौड़ती है पुलिस,
मगर न कहीं कोई डर से पीला पड़ता है,
न कहीं इंसानियत रोती है,
क्योंकि अब आदमी की जान नहीं,
मुआवजे की राशि सुर्खियों में होती है।
लोग खून की कीमत रुपयों से तो जोड़ देते हैं
मगर कोई नहीं देखता वो आँसू जो
बूढ़ी माँ की बूढ़ी, झुर्रीदार आँखों के समंदर में
किनारे पर आने से पहले दम तोड़ देते हैं।

कोई नहीं देखता
चूड़ियों के साथ जिंदगी की खनखनाहट का किर्च किर्च होना
और वासन्ती युवा मुस्कानों का
इतिहास होने की विवशता ढोना।
और सफेद साड़ी में लिपटकर काली स्याह रातों में रोना।

अब तो बस दो मिनट के मौन
और चंद शब्दों की श्रद्धांजलि में,
मांग में सिंदूर और होठों पर
मुस्कानों के महल उगा लिए जाते हैं
और जहाँ वारदात होती है,
वहाँ लाशों की सुरक्षा में
कुछ और सुरक्षाकर्मी लगा दिए जाते हैं।

इस महकमे की भी अजीब आबरु होती है
पुलिस की ड्यूटी
वारदात के बाद शुरु होती है।
सुनते हैं कि प्रशासनिक मजबूरी है
किसी कार्रवाई से पहले वारदात होना जरूरी है
और जब कोई वारदात हो जाती है

तो पुलिस केवल मुर्द ढोने आती है।
मरने वालों में जब तक अपना कोई नहीं होता
हममें से भी कोई नहीं रोता।
रोज-रोज की हत्याओं की ये खबरें
जब चाय पीते हुए लोग सुबह के नाश्ते के साथ निगल जाते हैं

तब पता चलता है कि कब कैसे और कहाँ
लोग संवेदनाशून्य जानवरों में बदल जाते हैं।
सभी के लिए तो यहाँ लटके हैं पिंजड़े
यहाँ आदमी कौन परिंदा कौन है
ये बात मैं आज तक नहीं समझ सका
इन मुर्दा बस्तियों में आखिर जिंदा कौन है।     

YYYYY