मंगलवार, 15 अक्टूबर 2013

पूजा का विधान: कितना कर्मकांड और कितना विज्ञान (भाग-दो)

बिल्बपत्र अथवा बेलपत्र की महिमा
            हिंदू पूजापाठ पद्धति में प्रत्येक देवी देवता के लिए कुछ खास प्रकार के फूलों, लकड़ियों, पत्रों आदि का विधान किया गया है। उदाहरण के लिए शिव पुराण एवं अन्यत्र कहा गया है कि शिवजी को बेलपत्र बहुत प्रिय है।  बेलपत्र के साथ उन पर दूध अर्पित किया जाना चाहिए। कभी आपने सोचा है कि ऐसा क्यों। शिवरात्रि के अवसर पर लाखों  बेलपत्र शंकर जी पर चढ़ाए जाते हैं और हजारों मन दूध उन पर अर्पित किया जाता है। बाद में बेलपत्र कूड़े की भेंट चढ़ जाते हैं और दूध नालियों में बह जाता है। लेकिन बहुत कम लोगों ने यह जानने का प्रयास किया होगा कि आखिर ऐसा किसलिए किया जाता है।

            यह भी बहुत बडा विज्ञान है जिसे हम आज तक नहीं समझ पाए और केवल अंधानुकरण किए चले जा रहे हैं। हमारे परिचित एक प्रसिद्ध वैद्यजी ने कभी बताया था कि बेलपत्र के साथ चढ़ाया गया दूध अमृत हो जाता है। यह दूध अनेक बीमारियों का नाशक होता है। आयुर्वेद में अनेक स्थानों पर इसका वर्णन आता है। अब यह बात विज्ञान ने भी सिद्ध कर दी है। अभी हाल में हुए एक शोध में पाया गया है कि बेलपत्र की चटनी बनाकर खाने से मधुमेह यानि शुगर जैसा रोग जड़ से समाप्त हो सकता है। 26 अप्रैल, 2010 के राष्ट्रीय सहारा में छपे समाचार के मुताबिक,. ’’बेल कैंसररोधी है और उसके पत्तों की चटनी और चूर्ण मधुमेह के रोगियों के लिए अचूक दवा भी है।...जिस तरह गंगाजल पवित्र होता है, उसी तरह यह फल भी पवित्र और गुणकारी माना गया है।’’

उपवास किसलिए
           खाना छोड़ दें, यह सुनने में थोड़ा कठिन लगता है लेकिन माह में एक बार उपवास रखने से दिल के दौरे से बचा जा सकता है। उपवास से दिल को मजबूती मिलती है। हाल ही में अंतर्राष्ट्रीय शोधकर्ताओं द्वारा किए गये एक     शोध के परिणामों में पाया गया कि माह में एक बार उपवास रखने से कॉरोनरी आर्टरी की बीमारी से 40 प्रतिशत तक बचा जा सकता है। प्रो. बेंजामिन हार्न के अनुसार उपवास रखने से लोगों के दिल को एक प्रकार का सुरक्षा लाभ मिलता है। उपवास से शरीर का मैटाबोल्जिम मजबूत होता है और उसे प्रभावशाली ढंग से दिल की बीमारी से लड़ने की शक्ति मिलती है।

            उटा विश्वविद्यालय के प्रो. बैंजामिन हार्न तथा अन्य शोधकर्ताओं ने 4,629 पुरूषों और महिलाओं की धमनियों का परीक्षण किया तो पाया कि उनमें जो उपवास रखते थे उनमे कॉरोनरी आर्टरी बीमारी का खतरा अन्य लोगों की तुलना में काफी कम था। प्रो. हार्न का कहना है कि इस परीक्षण में इस बात के मजबूत संकेत मिलते हैं कि उपवास करने वालों को दिल का दौरा पड़ने की आशंका कम रहती है। उपवास करने वालों में से 8 प्रतिशत लोगों ने किसी धार्मिक भावना से प्रेरित होकर अपना उपवास नहीं रखा था लेकिन इसके बावजूद उनमे कॉरोनरी आर्टरी की बीमारी बहुत कम थी लेकिन शोधकर्ताओं ने चेतावनी दी है कि जो व्यक्ति मधुमेह से ग्रस्त हैं, उनके लिए बिना डॉक्टर की सलाह के उपवास रखना खतरनाक साबित हो सकता है। इस शोध में कहीं भी इस बात के संकेत नहीं मिलते हैं कि मधुमेह के रोगियों को अपना खाना छोड़ना चाहिए।

दक्षिण दिशा में सिर करके ही क्यों सोएं
        यजुर्वेद शतपथ ब्राह्मण में एक निषेध वाक्य है-’’तस्मादु हूं न प्रतीचीन शिराः शर्यात‘‘ अर्थात पश्चिम दिशा में सिर करके कभी न सोएं। इसी प्रकार वैखानस गुह्य सूत्र में कहा गया है कि उत्तर तथा पश्चिम दिशाओं में सिर करके नहीं सोना चाहिए। हिंदू संस्कृति में निद्रा संबंधी मान्यताएं शरीर विज्ञान के आधार पर तय की गयी हैं। जैसे कि सोते समय हमारा सिर उत्तर दिशा की ओर ही क्यों नहीं होना चाहिए या दक्षिण दिशा की ओर पांव करके क्यों नहीं सोना चाहिए। यह मात्र किंवदन्ति नहीं बल्कि हमारे आत्मिक, मानसिक और कायिक स्वास्थ्य के दृष्टिगत एक समुचित व्यवस्था है जिसका मूलाधार विज्ञान है।

दरअसल इस सृष्टि के मूल में सौरजगत है। सौरजगत ध्रुव के आकर्षण पर अवलंबित है। विज्ञान ने पृथ्वी को एक बड़ा चुंबक माना है जिसके दो ध्रुव हैं-एक उत्तर और दूसरा दक्षिण। चुंबक की बल रेखाएं दक्षिण से उत्तर  की ओर गमन करती हैं। अतः उत्तर की ओर पैर करके सोने से हमारे शरीर के रक्त प्रवाह पर चुंबकीय बल का अनुकूल प्रभाव पड़ता है। रक्त का शोधन बढि़या तरीके से होता है। शरीर व्याधि मुक्त रहता है। हमारी पाचन प्रणाली सोते समय तीव्र गति से सक्रिय रहती है। यदि कोई व्यक्ति दक्षिण दिशा की ओर पैर और ध्रुव यानि उत्तर दिशा की ओर सिर करके सोएगा तो ध्रुवाकर्षण के कारण पाचन क्रिया के दौरान भोजन का अवशेष अंश नीचे की बजाए ऊपर की ओर गतिशील हो जाएगा। इससे हृदय और मस्तिष्क पर बुरा प्रभाव पड़ेगा। इसके विपरीत यदि हम उत्तर दिशा की ओर पांव करके सोएंगे तो चुंबकीय सिद्धांत के अनुसार भोजन का परिपाक ठीक होगा और नींद बढ़िया आएगी। निद्रा के बाद आप अपने आप को ज्यादा स्वस्थ अनुभव करेंगे क्योंकि ध्रुव आकर्षण सिद्धांत के अनुसार, दक्षिण से उत्तर दिशा की ओर चल रहा विद्युत प्रवाह हमारे मस्तिष्क से प्रविष्ट होकर पांवों के रास्ते निकलेगा। फलतः व्यक्ति की आयु बढ़ेगी। दुःस्वप्न भी नहीं आएंगे जबकि दक्षिण दिशा की ओर जिसे हिंदू शास्त्रों में यम (मृत्यु) का स्थान कहा गया है, पांव करके सोने से आयु घटती है। इसे मृत्युस्थान कहे जाने का यही कारण है।
           भारतीय संस्कृति में मृत्यु के पश्चात शव को उत्तर की ओर सिर करके लिटाने की परंपरा हैं। महर्षि दयानंद सरस्वती ने संस्कार विधि में लिखा है कि अन्त्येष्टि कर्म के समय मृतक का सिर उत्तर ध्रुव की ओर ही रखें क्योंकि हमारे शरीर का एक सूक्ष्म प्राण मस्तिष्क में भी होता है। दैहिक मृत्यु के बाद भी कुछ समय तक वह प्राण मस्तिष्क में रहता है। उत्तर की ओर शव का सिर रखने से वह प्राण शीघ्र ही निकल जाता है। श्मशानों के दरवाजे भी प्रायः इस तरीके से बनाए जाते हैं कि उसमें प्रवेश करते समय शव का सिर उत्तर की ओर रहे।

ध्यान का विज्ञान
            भारतीय उपासना पद्धति में ध्यान पर बहुत जोर दिया गया है। वैज्ञानिक शोधों ने एकबार फिर साबित कर दिया है कि भारतीय मनीषी और ऋषि-मुनि कितने महान थे और जिन पहेलियों को विज्ञान आज सुलझा रहा है, वे उन रहस्यों को हजारों वर्ष पहले जान चुके थे। 31 जनवरी, 2011 को दैनिक हिंदुस्तान में प्रकाशित एक लेख के अनुसार, नए जमाने की लाइफ स्टाइल वाली बीमारियों में ध्यान काफी उपयोगी है। कई शोधों में ध्यान के फायदों के सबूत मिले हैं। पिछले दिनों अमेरिका में हुए एक शोध ने यह बताया कि ध्यान से दिमाग में कुछ फायदेमंद बदलाव होते हैं। इस शोध से आठ सप्ताहों तक कुछ लोगों को नियमित रूप से ध्यान कराया गया जो कुछ-कुछ विपश्यना जैसा ध्यान था। शुरू में इन लोगों के दिमाग के एमआरआई स्कैन किए गए और आठ सप्ताह बाद फिर से एमआरआई जाँच की गई। जाँच से पता चला कि ध्यान करने वाले के दिमाग में हिप्पोकैंपस (Hippocampus) नामक भाग में ग्रे सैल की संख्या काफी बढ़ गई। हिप्पोकैंपस का संबंध याददाश्त और सीखने की प्रक्रिया से है यानि उसकी याददाश्त और सीखने की शक्ति बढ़ गई। यह भी देखा गया कि तनाव से संबंधित भाग जिसे एमाइग्डाला (Amygdala)  कहते हैं, उसमें ग्रे सैल की संख्या में कमी आ गई थी। जिन लोगों ने ध्यान नहीं किया था, उनमें ऐसे कोई परिवर्तन नहीं देखे गए।
            2009 के  एक शोध से पता चला कि ध्यान से हृदय रोग से पीडि़त लोगों का ब्लड प्रैशर कम हुआ और 2007 का एक शोध बताता है कि ध्यान करने से एकाग्रता की क्षमता बढ़ती है। 2008 में हुए एक शोध में एक और दिलचस्प बात सामने आई। शोधकर्ताओं ने पाया कि जब ध्यान करने वालों ने किसी व्यक्ति को तकलीफ में देखा तो उनके दिमाग के टेम्पोरल पेराइटल संधि स्थानों में सामान्य से ज्यादा हलचल हुई, इसका अर्थ यह है कि ध्यान करने वालों में दूसरों के प्रति संवेदनशीलता और सहानुभूति भी बढ़ जाती है। ये नतीजे बताते हैं कि ध्यान करना खुद के स्वास्थ्य के लिए भी अच्छा है और दूसरे के लिए भी यानि ध्यान केवल हमारी सेहत ही नहीं सुधारता बल्कि हमें बेहतर इंसान बनने में भी मदद करता है।

शनिवार, 12 अक्टूबर 2013

पूजा का विधान: कितना कर्मकांड और कितना विज्ञान (भाग-एक)



कई बार आप परेशान हो जाते होंगे कि हमारे पूजा पाठ अथवा पूजा पद्धति के साथ इतने सारे कर्मकांड जुड़े हुए हैं, इतने सारे विधान रखे गए हैं, अब पूजा करें या इन्हें पूरा करें। जगह जगह अनेक देवी देवताओं की पूजा के लिए तरह-तरह के विधि विधान किए गए हैं, उदाहरण के लिए गायत्री माता को गुड़हल का फूल पसंद है, शंकर जी को बेलपत्र अत्यन्त प्रिय है, तुलसी विष्णुप्रिया हैं। आखिर ये सब है क्या? कभी आपने सोचा कि हवन में आम की लकड़ी का ही प्रयोग क्यों होता है, पंचपल्लवों में पीपल और वट जैसे वृक्ष ही क्यों शामिल हैं, अन्य क्यों नहीं। खड़ाऊं लकड़ी की और आसन कुशा का ही क्यों होना चाहिए। पूजा का जल या वह जल जो मंदिरों में प्रसाद के साथ चरणामृत के रूप में वितरित होता है, वह तांबे के बर्तन में ही क्यों रखा जाता है। उसमें भी तुलसीदल क्यों? प्रश्न और संदेह बहुत सारे हैं लेकिन सही और तार्किक उत्तर संभवत: आसानी से नहीं मिलता। हम ये सब इसलिए करते हैं क्योंकि ऐसा करने का विधान है और इसलिए ऐसा करना चाहिए। बुजुर्गों और ऋषि मुनियों ने हमसे ऐसा करने का कहा और लिखा है, इसलिए ऐसा करना चाहिए। पर क्या आपने कभी यह सोचा कि ऐसा क्यों करना चाहिए और हमारे ऋषियों-मुनियों ने हमसे ऐसा करने के लिए क्यों कहा? क्यों उन्होंने इस प्रकार के विधि-विधान किए? क्यों उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि ऐसा हर हाल में किया ही जाना चाहिए अन्यथा पूजा अधूरी है। ईश्वर पूर्णतः प्रसन्न नहीं होंगे। नमन कीजिए अपने ऋषियों मुनियों को जिन्होंने कहने को तो आपको पूजा पाठ का विधान दिया और तमाम तरह के कर्मकांड निर्धारित किए। पर आपने यह बात शायद कभी नहीं सोची होगी कि हमारे ऋषि-मुनि कितने बड़े वैज्ञानिक थे। जिन बातों को विज्ञान आज ढूंढ रहा है या सत्य सिद्ध कर रहा है, उन्होंने उसकी व्यवस्था आज से हजारों साल पहले कर दी थी और उस विज्ञान को आपके पूजा पाठ से जोड़ दिया था ताकि बिना पढ़ा लिखा अनपढ़ व्यक्ति भी अनायास उसका लाभ उठा सके। हमारे मनीषी जानते थे कि बिना पढ़े लिखे या कम पढ़े लिखे व्यक्तियों को विज्ञान समझाया नहीं जा सकता लेकिन विज्ञान उनके जीवन में लाया जा सकता है, इसलिए उन्होंने सारे विज्ञान को पूजा पाठ, अध्यात्म और दिनप्रतिदिन के कर्मकांड से जोड़ दिया ताकि व्यक्ति पूजा के बहाने ही सही विज्ञान और प्रकृति (जो स्वयं ईश्वर का ही प्रतिरूप है) के सारे लाभ उठा सके। इससे उसकी अध्यात्मिकता तो बढ़ेगी ही, ईश्वर के प्रति उसका समर्पण बढ़ेगा और साथ ही उसे समस्त मानसिक, शारीरिक और अध्यात्मिक लाभ अनायास प्राप्त हो जाएंगे। आइए आज इसके अध्यात्मिक और वैज्ञानिक पक्ष को जानने की कोशिश करते हैं। इन तथ्यों की प्रामाणिकता सिद्ध करने के लिए इन पंक्तियों के लेखक ने यथासंभव उनके स्रोत का भी उल्लेख करने का प्रयास किया है जहाँ वे प्रमुखता से प्रकाशित, मुद्रित हुए या सामने आए। आइए सबसे पहले यह जान लेते हैं कि पूजा कहाँ करनी चाहिए।

पूजा का स्थान कहाँ होना चाहिए
      "शिवमहापुराण" की विद्येश्वर संहिता में कहा गया है कि यज्ञ (जप एवं पूजा) यदि अपने घर को शुद्ध करके वहीं किया जाए तो उसका फल साधारण ही होता है। गोशाला में करने पर उससे दस गुना शुभ फल मिलता है। इससे भी दस गुना फल किसी जलाशय के किनारे जप-यज्ञ करने पर होता है। जिस जगह पीपल, बेल और तुलसी के वृक्ष हों, उस स्थान पर पूजा करने से जलाशय के तट से भी दस गुना फल मिलता है। मंदिर में उससे भी दस गुना, तीर्थस्थान पर मंदिर से दस गुना, नदी के किनारे उससे भी दस गुना। तीर्थस्थान की नदी के किनारे किए हुए पूजा कार्यों का फल सामान्य नदी के किनारे से दस गुना होता है। सप्तगंगा नामक नदियों के तीर्थ पर जप-यज्ञ का फल भी दस गुना होता है। गंगा, गोदावरी, कावेरी, ताप्ती, सिंधु, सरयू और नर्मदा को सप्तगंगा कहते हैं। समुद्र के किनारे पर सप्तगंगा से भी दस गुना और पर्वत की चोटी पर किए गए पूजा कार्य का फल समुद्र-तट से भी दस गुना होता हैं। लेकिन अंत में भगवान शंकर पार्वती जी से कहते हैं कि सबसे अधिक महत्व का वह स्थान होता है, जहाँ मन लग जाए। अब यह मन कहा लगता है? वहाँ जहाँ आप नियमित रूप से रोज पूजन करते हैं यानि आपका अपना पूजनस्थल और पूजा का आसन।

कुशा का आसन ही क्यों
     पूजा के लिए कुशा के आसन का विधान किया गया है और पूजा के स्थान तक या मंदिर के अंदर तक खड़ाऊं के प्रयोग की तो अनुमति है। किसी और तरह की चप्पल या जूते का प्रयोग आप नहीं कर सकते। आखिर क्यों? जब हम पूजा अर्चना करते हैं तो शरीर में एक विशेष प्रकार की ऊर्जा उत्पन्न होती है जिसे आप विद्युत तरंग भी कह सकते हैं और यही जीवनदायिनी शक्ति है। यदि आप विज्ञान के विद्यार्थी रहे हैं तो आपको पता होगा कि पृथ्वी और जल-ये दोनों ऊर्जा या विद्युत के सुचालक हैं यानि बड़ी तेजी से विद्युत को अपने भीतर खींच लेते हैं। इसी वजह से इन दोनों में करंट भी बहुत तेज लगता है जबकि लकड़ी ऊर्जा का सबसे बड़ा कुचालक है अर्थात वह ऊर्जा को स्थानांतरित नहीं होने देती। यही कारण है कि मंदिर में कुशा के आसन (जो लकड़ी का ही एक प्रकार है) और खड़ाऊं का प्रयोग किया जाता है ताकि आपके शरीर में उत्पन्न हुई ऊर्जा धरती में न समाकर आपके शरीर में ही बनी रहे और आपको अनेक प्रकार के स्वास्थ्य एवं अन्य लाभ दे।

जौ का प्रयोग
     जिस समय अखंड नवरात्र पूजन या पुरश्चरण आदि के लिए कलश स्थापना की जाती है तो मिट्टी के एक सकोरे (बर्तन) में मिट्टी भरकर उसमें जौ बोए जाते हैं और फिर उस पर कलश की स्थापना की जाती है। यहाँ भी देखिए विज्ञान काम फिर कर रहा है। यह सदियों पुरानी व्यवस्था है और आज वैज्ञानिक यह पता लगाने में कुछ हद तक सफल हुए हैं कि जौ की महत्ता क्या है। 18 अगस्त, 2010 के दैनिक हिंदुस्तानमें छपी खबर के मुताबिक, जौ का सेवन करने वाले व्यक्तियों का रक्तचाप अन्य लोगों की तुलना में कम अथवा सामान्य रहता है। डॉक्टर कारिण रेड की अगुवाई में एक अंतर्राष्ट्रीय दल ने एडीलेड विश्वविद्यालय में अनुसंधान किया और पाया कि जौ के छिलके उच्च रक्तचाप के इलाज में मदद कर सकते हैं। मैटूरिटास जर्नल में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार, कच्चा या पकाया हुआ जौ नहीं बल्कि पके हुए जौ का छिलका ब्लड प्रैशर से बहुत ही कारगर तरीके से लड़ता है। 12 सप्ताह के परीक्षण में दल ने 50 लोगों को शामिल किया और पाया कि जिन्होंने पके हुए जौ के छिलकों को खाया, उनका ब्लड प्रैशर औरों के मुकाबले कम हुआ।

पंचगव्य का प्रयोग/गोबर के वैज्ञानिक तथ्य
     गोमूत्र चिकित्सा एवं अनुसंधान केन्द्र, के श्री वीरेन्द्र कुमार जैन ने प्रैस एनक्लेव, दिल्ली से प्रकाशित ’विश्व हिंदी दर्शन‘ पत्रिका में प्रकाशित अपने एक लेख में लिखा है कि गोमाता चलता-फिरता चिकित्सालय एवं औषधियों का भण्डार हैं। गोमूत्र चिकित्सा पद्धति से घर पर ही अनेक असाध्य रोग का इलाज किया जा सकता है। पंचगव्य में रोगों को ठीक करने की अद्भुत क्षमता है। चरक संहिता, रानिघंटु, वृद्धवाग् भटट्, अमृतसागर में वर्णन आया है कि गोमूत्र कड़क, चरका, कसैला, तीक्ष्ण, उष्ण, पंचरस युक्त है। यह पवित्र, विषनाशक, जीवाणुनाशक, त्रिदोषनाशक, तान्त्रिक, मेघाशक्तिवर्द्धक, शीघ्रपाचक, परम रसायन, आनंद एवं बल-बुद्धि प्रदान करने वाला है। यह आयुप्रदाता, रक्त के समस्त विकारों तथा कफ, वात और पित्तजन्य तीन दोषों, हदयरोग व विष के प्रभाव को दूर करने वाला है। सुश्रुत संहिता में लिखा है कि गोमूत्र शूल, गुल्म, उदर, अनाह कुण्डु, ,खुजली, मुखरोगनाशक है। यह किलास, कुष्ठ, आमबस्ति तथा नेत्ररोग नाशक है। इससे अतिसार, वायु के सब विकार, काँस, शोथ, उदर रोग, कीटाणुनाशक, पाण्डु, श्वास, मलावरोध, कामला बिल्कुल ठीक होते हैं। भावप्रकाश में वर्णन है कि गोमूत्र लघु अग्नि दीपक, मस्तिष्क के ज्ञान-तंतुओं को बढ़ाने वाला है। इससे पेट में दर्द, वायुगोला, पेट के अन्य रोग, नेत्ररोग, मुख के सभी रोग, सफेद दाग, रक्त विकार, सभी कुछ ठीक होते हैं। गोमूत्र पीलिया, रक्त की कमी, दस्त लगना, सभी कीटाणु नष्ट करता है। लीवर तिल्ली, सूजना, बवासीर, कान में डालने से कान के रोग नष्ट होते हैं। आखिर गोमूत्र में क्या है जो 5 हजार तरह की बीमारियों से छुटकारा दिला सकता है। परीक्षण में पाया गया है कि इसमें नाईट्रोजन, सल्फर, फास्फेट, सोडियम, पोटेशियम, मैग्नीज, कार्बनिक एसिड, आयरन, सिलीकान, क्लोरिन, मैग्नेशियम, साइट्रिक एसिड, टाट्रिक् एसिड, कैल्शियम, साल्ट, विटामिन ए,बी,सी,डी,ई, मिनरल्स, लेक्टोज, एन्जाइम्स, जल, हिप्यूरिक एसिड, क्रिएटिनिन, स्वर्ण क्षार आदि होते हैं। मनुष्य के शरीर में जल तत्व मौजूद हैं उनमें कमी या अधिकता होने पर ही अधिकांश बीमारियाँ होती हैं। अतः इन तत्वों से युक्त प्राकृतिक दवाई यानि गोमूत्र का सेवन शरीर में जिन तत्वों के अधिकता या कमी होती है उसे संतुलित करके असाध्य रोगों को ठीक कर देता है। कैंसर के मरीजों के लिए गोमूत्र एवं गोबररस एक उत्तम प्रकार की कीमोथेरेपी है, जिसका कोई साइडइफेक्ट नहीं है। गोमूत्र खराब नहीं ह¨ता, किन्तु इसे काँच अथवा मिट्टी के बर्तन में रखना चाहिए फ्रिज में नहीं। गर्भवती गाय का मूत्र बछड़े को जन्म देने के 15 दिन पहले और बाद में छोड़कर बाकी समय में उपयोग किया जा सकता है। यह गंगाजल की तरह से पवित्र है।

मंगलवार, 8 अक्टूबर 2013

क्या आपने भी नवरात्र के व्रत रखे हैं?

पिछले शनिवार से नवरात्र के व्रत शुरु हो गए हैं। उम्मीद है आपने भी आठों या नौ के नौ दिन के लिए व्रत रखे होंगे। अष्टमी या नवमी का व्रत तो जरुर रखेंगे। उम्मीद है कि आपने व्रत का खाना भी खाना शुरु कर दिया होगा। मुझे सबसे ज्यादा तरस बेचारे आलू पर आ रहा है। जिस आलू को एक व्यक्ति एक सप्ताह में आधा किलो के हिसाब से खाता था, उसे आजकल प्रतिदिन एक किलो प्रतिव्यक्ति के हिसाब से डकारा जा रहा है। पीछे पीछे कुटू के आटे की पकौड़ियाँ आ जाती हैं या फिर मखाने की खीर। लौकी की खीर भी उतनी ही डिमांड में है। भुने हुए मखाने खाने का मज़ा तो कुछ और ही है। टाटा का नमक तो बेचारा सौतेला हो गया है पर सेंधा नमक के पहाड़ तो एक के बाद एक ढह रहे हैं। रोजाना की तुलना में दोगुना डालो तब कहीं जाकर नमक का स्वाद आता है। हरी मिर्ची पर भी काफी हॉट हो गई है। भुना जीरा ऊपर से पड़ जाए तो कहने ही क्या। रोज चार-पाँच सेब, केले और दूसरे फलों को तो मैं इसमें जोड़ ही नहीं रहा हूँ। भाईसाहब, घबराइए मत, मैं खाने का नहीं व्रत के तुच्छ से फलाहारी भोजन का जिक्र कर रहा हूँ। हम सब आजकल व्रती हैं और पेट की आँतें बेचारी परेशान है-मेरा व्रत क्यों नहीं हुआ। इससे मुझे क्या लाभ हुआ आखिर। मुझे तो और दिनों की तुलना में कई गुनी मेहनत करनी पड़ रही है। साहब बेचारे व्रत पर हैं, मेमसाहब भी व्रती हैं पर पेट का दु:खड़ा सुनने को कोई तैयार नहीं। भैयाजी, ये व्रत है चरत। पूरे दिन चरते जा रहे हैं और तुर्रा यह कि हम व्रती हैं। शायद व्रत या उपवास का वास्तविक अर्थ हम समझते ही नहीं। व्रत या उपवास का अर्थ है-इंद्रियों पर संयम, भोजन में संयम, शयन में संयम। इंद्रियाँ भी मशीनों की तरह हैं, सचमुच उपवास रखें तो इन इंद्रियों को कुछ आराम मिले और मन भीतर की ओर केंद्रित हो। शरीर के साथ-साथ आत्मा की ओवरहालिंग भी हो जाए। चटपटे मसालों को जीभ कुछ दिन के लिए त्याग दे तो एक दूसरी दुनिया का स्वाद मिले।

रविवार, 1 सितंबर 2013

कसौली जाएं तो हनुमान जी के सिद्ध मंदिर में दर्शन अवश्य करें

अभी हाल में रम्य वादियों से घिरे खूबसूरत पहाड़ी स्थल- कसौली जाने का अवसर मिला। चंडीगढ़-शिमला राजमार्ग पर स्थित कसौली चंडीगढ़ से -करीब 70-75 किलोमीटर दूर है और सोलन जिले के अंतर्गत आता है। एक कार्यालय का निरीक्षण करने के सिलसिले में यहाँ पहुंचा तो मौसम बेहद शानदार और खुशगवार था और बादलों की घनी घटाओं ने हमें अपने घेरे में ले लिया था। बादल के टुकड़े बदन को छू-छूकर निकल रहे थे। दूर कहीं एक गीत बज रहा था-ये कौन आया, रोशन हो गई महफिल जिसके नाम से। क्या इसीलिए ये हमें छू-छू कर देख रहे थे? ये कल्पना भी अद्भुत है। यहाँ के एयरफोर्स स्टेशन के अंतर्गत आने वाले क्षेत्र का सबसे बड़ा आकर्षण है-हनुमान जी का सिद्ध मंदिर। जहाँ यह मंदिर स्थित है उसे Manky Point कहा जाता है। संभव है तमाम बंदरों के वहाँ होने के कारण इसका नाम मंकी पॉइंट पड़ा हो और अंग्रेजी में इसे बिगाड़ कर ऐसा कहा जाने लगा हो। हनुमान जी का मंदिर हो और बंदर न हों,ऐसा तो हो ही नहीं सकता। यहाँ तक जाने के लिए लगभग एक हजार सीढ़ियाँ घूम घूम कर चढ़नी पड़ती हैं। तब जाकर मंदिर की दीवारें आरंभ होती हैं और मंदिर के अहाते में बना हेलीपेड नज़र आता है। इस स्थान के बारे में मान्यता है कि संजीवनी बूटी लाते समय हनुमान जी का पाँव दो स्थानों पर टकराया। दायां पाँव जहाँ टकराया, वह स्थान शिमला का जाखू है और बायां पाँव जहाँ टकराया, वह कसौली का यही स्थान है। पाँव के आकार की चोटी पर ही यह मंदिर बना हुआ है। मंदिर की ऊँचाई लगभग 7220 फुट है। मंदिर में "लाल देह लाली लसे" वाले हनुमान जी नहीं हैं बल्कि चमचमाते सफेद संगमरमर की दिव्य मूर्ति है जिसका आकर्षण इतना ज्यादा है कि बस आदमी उन्हें निहारता ही रह जाए। साथ में दुर्गा माँ हैं, भगवान भोले हैं, गणेश जी हैं और भगवान विष्णु भी। बजरंगी के दर्शन ने तन-मन की सारी थकान दूर कर दी। हनुमान जी के दर्शन करते-करते नज़र ऊपर को उठी तो देखा कि कपीश्वर के जन्म के बारे में बड़ा बढ़िया श्लोक भी लिखा है। मैंने उसे नोट कर लिया- श्रीकृष्ण चतुर्दश्यां भौमे स्वात्यां कपीश्वर। मेषलग्ने अंजनीगर्भात् प्रादूर्भूत स्वय: शिव।। ("अगस्त्य संहिता") चूंकि यह स्थान सामरिक रक्षा की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है, इसलिए किसी भी स्थान की फोटो लेना निषिद्ध ही नहीं है, आप यहाँ कैमरा तो छोड़िए, पेनड्राइव तक नहीं ले जा सकते।

सोमवार, 15 अप्रैल 2013


कविता नहीं कुरुक्षेत्र
 

ये शहर

लिज़लिज़ाहट भरे स्पर्शों और संबंधों का है

ये शहर

अमावस्या में रोशनी तलाशते अंधों का है।

हो सकता है ये शहर

कुछ न दे आपको-

न सांत्वना, न सहानुभूति

न अपनापन, न मरहम,

लेकिन जख्म न दे, नमक न दे

यह नहीं हो सकता।

 
पता नहीं दौड़ती हैं गाड़ियाँ या सड़कें

भागता है आदमी या उम्र,

कटता है वक्त या आदमी स्वयं से

ये सोचने से पहले

इस शहर का हर बच्चा जवान हो जाता है

और जवानी सोचने के लिए नहीं होती।

 
इसलिए हर कोई

अपने बचपन की ओर दौड़ता है

बस्तों के बोझ से

छिल गई हैं मासूम हथेलियाँ

बच्चे अब स्कूलों में नहीं

यातनागृहों में जाते हैं

जहाँ ‘अ’ से अनार, ‘आ’ से आम नहीं

‘अ’ से अज्ञात, ‘आ’ से आतंकवादी पढ़ाया जाता है।

साँझ ढले जब लौटता है बच्चा

तो चेहरे पर

खेलने की ललक नहीं

दुबकने की दहशत होती है।

गाँधी अब गांडीव हो गया है

कलम की जगह

हाथों में आ गई हैं बंदूकें

अब कविता नहीं, कुरुक्षेत्र लिखा जाता है।

कुछ और कविताएं


          जाने क्यूं पिछले कुछ दिनों से सोया हुआ संवेदनशील प्राणी फिर से कविता की उन्हीं गलियों में लौट जाना चाहता है जिन गलियों को बड़े शहर की व्यस्तताओं ने लगभग भुला दिया है। मन आज आगे जाने की बजाय पीछे भागने को तैयार है। हो सकता है-आज कई सारी कविताएं सुना डाले-
एक जिंदा आदमी की मौत

‘आदमी हो या दरिंदा हो

जिंदा रहना ही काफी नहीं

जिंदा रहने का अहसास भी तो जिंदा हो।‘


मेरे इस वाक्य का अर्थ

जब उनकी दृष्टि से पहचाना गया

तो इसे राष्ट्रद्रोह से भी बड़ा माना गया

और चूंकि मैंने

वक्त से पहले, मारे जाने के खिलाफ

ज़ेहाद छेड़ी है

इसलिए उनकी भेंगी दृष्टि में

मेरी सोच की ज़मीन जरा टेढ़ी है।


कितना बड़ा अपराधी हूँ मैं

मरने और मारने के इस दौर में,

जिंदा रहने का आदी हूँ मैं

कदाचित इसी से कुछ मुर्दे

घबराने लगे हैं

और उन्हें

एक अभूतपूर्व विद्रोह के आसार

नज़र आने लगे हैं।

 
इसीलिए आजकल,

नपुंसकों की एक मुर्दा फौज

मेरे खिलाफ

हाथों में बड़े-बड़े विज्ञापन लिए

सीने पर उधार के पोस्टर चिपकाए

पागल कुत्ते की तरह

मुझे मारने पर आमादा है।

 
टुकड़ा-टुकड़ा साँस लेती

इन  मुर्दा बस्तियों में,

जिधर देखो, जिधर घूमो

एक ही अफवाह है, एक ही चर्चा है-

देखो तो कैसा कलियुग आ गया है

कितना अजीब वाशिन्दा है

बिना मुर्दों की इजाज़त लिए

एक आदमी जिंदा है।

 
जानता हूँ

अफवाह और तेज होगी

दंगा भड़केगा, गोली चलेगी

एक जिंदा आदमी की आहुति देने के लिए

जाने कितने उसूलों की होली जलेगी।

मेरा ये शरीर मुर्दों की जमात में

लाया ही जाएगा

मैं चीख-चीख कर

अपने जिंदा होने का प्रमाण दूंगा

मगर फिर भी उसे दफनाया ही जाएगा।

 
और----

अगले दिन,

किसी क्षेत्रीय अखबार के

किसी एक कोने में,

एक छोटी-सी खबर होगी-

‘एक जिंदा आदमी की रहस्यमय मौत।’

 
किंतु एक जिंदा आदमी की यह मौत

कभी न बेअसर जाएगी,

मेरा यकीन है

मेरे राख होने से पहले ही

एक मौत

जाने कितने मुर्दों को जिंदा कर जाएगी।

सोमवार, 8 अप्रैल 2013

कुछ छंदमुक्त कविताएं

        एक बार फिर से आपके सामने आने पर बड़ी प्रसन्नता महसूस हो रही है। बेहद व्यस्तता के कारण कई महीनों से अपने ब्लॉग पर चाहकर भी कुछ पोस्ट नहीं कर पाया। कभी कार्यालय में व्यस्तता तो कभी देश के कई स्थानों पर राजभाषा सम्मेलनों के आयोजक के रूप में जिम्मेदारी के कारण, वक्त ही नहीं निकाल सका। आज अपनी कुछ पुरानी लोकप्रिय कविताओं को आप सबके साथ बाँटकर भीतर का सृजनशील प्राणी फिर से आपके सामने आना चाहता है:


अंदर का आदमी

कोई नहीं चाहता सुगंधि ढोना
अब अभिशाप है गुलाब होना
क्योंकि व्यवस्था का यह प्रश्न बहुत पुराना है,
पराग,सुगंधि और मकरंद का मतलब
एक-न-एक दिन मसला जाना है

कदाचित इसीलिए हमने
अपने चारों ओर काँटे ही काँटे बो लिए हैं,और अजाने ही,
अनायास ही हम सब नागफनी हो लिए हैं।

यह जो नया विश्लेषण है
यह जो नई रीत है
मेरे अंदर का आदमी, इसी से भयभीत है।
बाहर के आदमी की भीतर के आदमी से
जन्म-जन्मांतर की दुश्मनी है
दोनों में हमेशा ठनी है।

लेकिन आज के समाज की ये कैसी मजबूरी है
बाहर के आदमी को जिंदा रखने की खातिर
अंदर के आदमी की हत्या जरूरी है।

आज के दौर का हर आदमी इस चक्रव्यूह का मारा है
और नैतिकता की परिधि में
आज हर व्यक्ति हत्यारा है,
आप भी हत्यारे हैं, मैं भी हत्यारा हूँ
आप भी शापित हैं, मेरा सर्वस्व भी शर्मिन्दा है
फर्क सिर्फ इतना सा है
आपके बाहर का आदमी बचा है,
मेरे भीतर का आदमी जिंदा है। 
                                                  

  वारदात के बाद 

पहले कहीं किसी बस्ती में
एक खून पर भी मच जाता था तहलका,
खून खौल उठता था सबका,
मगर अब सामूहिक हत्याकांड भी
तहलका तो क्या सनसनी भी पैदा नहीं करता
बीस-तीस लोगों के मरने से पहले मानों कोई नहीं मरता।

हर हत्या के बाद
चीखता है सायरन/ दौड़ती है पुलिस,
मगर न कहीं कोई डर से पीला पड़ता है,
न कहीं इंसानियत रोती है,
क्योंकि अब आदमी की जान नहीं,
मुआवजे की राशि सुर्खियों में होती है।
लोग खून की कीमत रुपयों से तो जोड़ देते हैं
मगर कोई नहीं देखता वो आँसू जो
बूढ़ी माँ की बूढ़ी, झुर्रीदार आँखों के समंदर में
किनारे पर आने से पहले दम तोड़ देते हैं।

कोई नहीं देखता
चूड़ियों के साथ जिंदगी की खनखनाहट का किर्च किर्च होना
और वासन्ती युवा मुस्कानों का
इतिहास होने की विवशता ढोना।
और सफेद साड़ी में लिपटकर काली स्याह रातों में रोना।

अब तो बस दो मिनट के मौन
और चंद शब्दों की श्रद्धांजलि में,
मांग में सिंदूर और होठों पर
मुस्कानों के महल उगा लिए जाते हैं
और जहाँ वारदात होती है,
वहाँ लाशों की सुरक्षा में
कुछ और सुरक्षाकर्मी लगा दिए जाते हैं।

इस महकमे की भी अजीब आबरु होती है
पुलिस की ड्यूटी
वारदात के बाद शुरु होती है।
सुनते हैं कि प्रशासनिक मजबूरी है
किसी कार्रवाई से पहले वारदात होना जरूरी है
और जब कोई वारदात हो जाती है

तो पुलिस केवल मुर्द ढोने आती है।
मरने वालों में जब तक अपना कोई नहीं होता
हममें से भी कोई नहीं रोता।
रोज-रोज की हत्याओं की ये खबरें
जब चाय पीते हुए लोग सुबह के नाश्ते के साथ निगल जाते हैं

तब पता चलता है कि कब कैसे और कहाँ
लोग संवेदनाशून्य जानवरों में बदल जाते हैं।
सभी के लिए तो यहाँ लटके हैं पिंजड़े
यहाँ आदमी कौन परिंदा कौन है
ये बात मैं आज तक नहीं समझ सका
इन मुर्दा बस्तियों में आखिर जिंदा कौन है।     

YYYYY