हिंदू पूजापाठ पद्धति में प्रत्येक देवी देवता के लिए कुछ खास प्रकार के फूलों, लकड़ियों, पत्रों आदि का विधान किया गया है। उदाहरण के लिए शिव पुराण एवं अन्यत्र कहा गया है कि शिवजी को बेलपत्र बहुत प्रिय है। बेलपत्र के साथ उन पर दूध अर्पित किया जाना चाहिए। कभी आपने सोचा है कि ऐसा क्यों। शिवरात्रि के अवसर पर लाखों बेलपत्र शंकर जी पर चढ़ाए जाते हैं और हजारों मन दूध उन पर अर्पित किया जाता है। बाद में बेलपत्र कूड़े की भेंट चढ़ जाते हैं और दूध नालियों में बह जाता है। लेकिन बहुत कम लोगों ने यह जानने का प्रयास किया होगा कि आखिर ऐसा किसलिए किया जाता है।
यह भी बहुत बडा विज्ञान है जिसे हम आज तक नहीं समझ पाए और केवल अंधानुकरण किए
चले जा रहे हैं। हमारे परिचित एक प्रसिद्ध वैद्यजी ने कभी बताया था कि बेलपत्र के
साथ चढ़ाया गया दूध अमृत हो जाता है। यह दूध अनेक बीमारियों का नाशक होता है।
आयुर्वेद में अनेक स्थानों पर इसका वर्णन आता है। अब यह बात विज्ञान ने भी सिद्ध
कर दी है। अभी हाल में हुए एक शोध में पाया गया है कि बेलपत्र की चटनी बनाकर खाने
से मधुमेह यानि शुगर जैसा रोग जड़ से समाप्त हो सकता है। 26 अप्रैल,
2010 के राष्ट्रीय सहारा में छपे समाचार के मुताबिक,.
’’बेल कैंसररोधी है और उसके पत्तों की चटनी और चूर्ण मधुमेह
के रोगियों के लिए अचूक दवा भी है।...जिस तरह गंगाजल पवित्र होता है,
उसी तरह यह फल भी पवित्र और गुणकारी माना गया है।’’
उपवास किसलिए
खाना छोड़ दें, यह सुनने में थोड़ा कठिन लगता है लेकिन माह में एक बार उपवास रखने से दिल के दौरे
से बचा जा सकता है। उपवास से दिल को मजबूती मिलती है। हाल ही में अंतर्राष्ट्रीय शोधकर्ताओं द्वारा किए गये
एक शोध के परिणामों में पाया गया कि
माह में एक बार उपवास रखने से कॉरोनरी आर्टरी की बीमारी से 40 प्रतिशत तक बचा जा सकता है। प्रो. बेंजामिन हार्न के अनुसार उपवास रखने से लोगों के दिल को एक प्रकार का सुरक्षा लाभ मिलता है। उपवास से शरीर का मैटाबोल्जिम
मजबूत होता है और उसे प्रभावशाली ढंग से दिल की बीमारी से लड़ने की शक्ति मिलती
है।
उटा विश्वविद्यालय के प्रो. बैंजामिन हार्न तथा अन्य शोधकर्ताओं ने 4,629 पुरूषों और महिलाओं की धमनियों का परीक्षण किया तो पाया कि उनमें जो उपवास रखते थे उनमे कॉरोनरी आर्टरी बीमारी का खतरा अन्य लोगों की तुलना में
काफी कम था। प्रो. हार्न का कहना
है कि इस परीक्षण में इस बात के मजबूत संकेत मिलते हैं कि उपवास करने वालों को दिल का दौरा पड़ने की आशंका कम रहती है। उपवास करने वालों में से 8 प्रतिशत लोगों ने किसी धार्मिक भावना से प्रेरित होकर अपना उपवास नहीं रखा था
लेकिन इसके बावजूद उनमे कॉरोनरी आर्टरी की बीमारी बहुत कम थी लेकिन शोधकर्ताओं ने
चेतावनी दी है कि जो व्यक्ति
मधुमेह से ग्रस्त हैं, उनके लिए बिना
डॉक्टर की सलाह के उपवास रखना खतरनाक साबित हो सकता है। इस शोध में कहीं भी इस बात के संकेत नहीं मिलते
हैं कि मधुमेह के रोगियों को अपना खाना छोड़ना चाहिए।
दक्षिण दिशा में सिर करके ही क्यों सोएं
यजुर्वेद शतपथ ब्राह्मण में एक निषेध वाक्य है-’’तस्मादु हूं न प्रतीचीन शिराः शर्यात‘‘ अर्थात पश्चिम दिशा में सिर करके कभी न सोएं। इसी प्रकार
वैखानस गुह्य सूत्र में कहा गया है कि उत्तर तथा पश्चिम दिशाओं में सिर करके नहीं
सोना चाहिए। हिंदू संस्कृति में निद्रा संबंधी मान्यताएं शरीर विज्ञान के आधार पर
तय की गयी हैं। जैसे कि सोते समय हमारा सिर उत्तर दिशा की ओर ही क्यों नहीं होना
चाहिए या दक्षिण दिशा की ओर पांव करके क्यों नहीं सोना चाहिए। यह मात्र किंवदन्ति नहीं
बल्कि हमारे आत्मिक, मानसिक और
कायिक स्वास्थ्य के दृष्टिगत एक समुचित व्यवस्था है जिसका मूलाधार विज्ञान है।
दरअसल इस सृष्टि के मूल में सौरजगत है। सौरजगत ध्रुव के
आकर्षण पर अवलंबित है। विज्ञान ने पृथ्वी को एक बड़ा चुंबक माना है जिसके दो ध्रुव
हैं-एक उत्तर और दूसरा दक्षिण। चुंबक की बल रेखाएं दक्षिण से उत्तर की ओर गमन करती हैं। अतः उत्तर की ओर पैर करके
सोने से हमारे शरीर के रक्त प्रवाह पर चुंबकीय बल का अनुकूल प्रभाव पड़ता है। रक्त
का शोधन बढि़या तरीके से होता है। शरीर व्याधि मुक्त रहता है। हमारी पाचन प्रणाली
सोते समय तीव्र गति से सक्रिय रहती है। यदि कोई व्यक्ति दक्षिण दिशा की ओर पैर और
ध्रुव यानि उत्तर दिशा की ओर सिर करके सोएगा तो ध्रुवाकर्षण के कारण पाचन क्रिया
के दौरान भोजन का अवशेष अंश नीचे की बजाए ऊपर की ओर गतिशील हो जाएगा। इससे हृदय और
मस्तिष्क पर बुरा प्रभाव पड़ेगा। इसके विपरीत यदि हम उत्तर दिशा की ओर पांव करके
सोएंगे तो चुंबकीय सिद्धांत के अनुसार भोजन का परिपाक ठीक होगा और नींद बढ़िया
आएगी। निद्रा के बाद आप अपने आप को ज्यादा स्वस्थ अनुभव करेंगे क्योंकि ध्रुव
आकर्षण सिद्धांत के अनुसार, दक्षिण से उत्तर दिशा की ओर चल रहा विद्युत प्रवाह हमारे मस्तिष्क से प्रविष्ट
होकर पांवों के रास्ते निकलेगा। फलतः व्यक्ति की आयु बढ़ेगी। दुःस्वप्न भी नहीं
आएंगे जबकि दक्षिण दिशा की ओर जिसे हिंदू शास्त्रों में यम (मृत्यु) का स्थान कहा
गया है,
पांव करके सोने से आयु घटती है। इसे मृत्युस्थान कहे जाने
का यही कारण है।
भारतीय संस्कृति में मृत्यु के पश्चात शव को उत्तर की ओर
सिर करके लिटाने की परंपरा हैं। महर्षि दयानंद सरस्वती ने संस्कार विधि में
लिखा है कि अन्त्येष्टि कर्म के समय मृतक का सिर उत्तर ध्रुव की ओर ही रखें
क्योंकि हमारे शरीर का एक सूक्ष्म प्राण मस्तिष्क में भी होता है। दैहिक मृत्यु के
बाद भी कुछ समय तक वह प्राण मस्तिष्क में रहता है। उत्तर की ओर शव का सिर रखने से
वह प्राण शीघ्र ही निकल जाता है। श्मशानों के दरवाजे भी प्रायः इस तरीके से बनाए
जाते हैं कि उसमें प्रवेश करते समय शव का सिर उत्तर की ओर रहे।
ध्यान का विज्ञान
भारतीय
उपासना पद्धति में ध्यान पर बहुत जोर दिया गया है। वैज्ञानिक शोधों ने एकबार फिर
साबित कर दिया है कि भारतीय मनीषी और ऋषि-मुनि कितने महान थे और जिन पहेलियों को
विज्ञान आज सुलझा रहा है, वे उन रहस्यों को हजारों वर्ष पहले जान चुके थे। 31 जनवरी, 2011 को दैनिक हिंदुस्तान में प्रकाशित एक लेख के अनुसार,
नए जमाने की लाइफ स्टाइल वाली बीमारियों में ध्यान काफी
उपयोगी है। कई शोधों में ध्यान के फायदों के सबूत मिले हैं। पिछले दिनों अमेरिका
में हुए एक शोध ने यह बताया कि ध्यान से दिमाग में कुछ फायदेमंद बदलाव होते हैं।
इस शोध से आठ सप्ताहों तक कुछ लोगों को नियमित रूप से ध्यान कराया गया जो कुछ-कुछ
विपश्यना जैसा ध्यान था। शुरू में इन लोगों के दिमाग के एमआरआई स्कैन किए गए और आठ
सप्ताह बाद फिर से एमआरआई जाँच की गई। जाँच से पता चला कि ध्यान करने वाले के
दिमाग में हिप्पोकैंपस (Hippocampus) नामक भाग में ग्रे सैल की संख्या काफी बढ़ गई।
हिप्पोकैंपस का संबंध याददाश्त और सीखने की प्रक्रिया से है यानि उसकी याददाश्त और
सीखने की शक्ति बढ़ गई। यह भी देखा गया कि तनाव से संबंधित भाग जिसे एमाइग्डाला (Amygdala) कहते हैं, उसमें ग्रे सैल की संख्या में कमी आ गई थी। जिन लोगों ने
ध्यान नहीं किया था, उनमें ऐसे कोई
परिवर्तन नहीं देखे गए।
2009 के एक शोध से पता चला कि ध्यान से
हृदय रोग से पीडि़त लोगों का ब्लड प्रैशर कम हुआ और 2007 का एक शोध बताता है कि ध्यान करने से एकाग्रता की क्षमता
बढ़ती है। 2008 में हुए एक शोध में एक और दिलचस्प बात सामने आई।
शोधकर्ताओं ने पाया कि जब ध्यान करने वालों ने किसी व्यक्ति को तकलीफ में देखा तो
उनके दिमाग के टेम्पोरल पेराइटल संधि स्थानों में सामान्य से ज्यादा हलचल हुई,
इसका अर्थ यह है कि ध्यान करने वालों में दूसरों के प्रति
संवेदनशीलता और सहानुभूति भी बढ़ जाती है। ये नतीजे बताते हैं कि ध्यान करना खुद
के स्वास्थ्य के लिए भी अच्छा है और दूसरे के लिए भी यानि ध्यान केवल हमारी सेहत
ही नहीं सुधारता बल्कि हमें बेहतर इंसान बनने में भी मदद करता है।