आज जाने क्यूं कवि मन कुछ कहने को बेताब है। अब तक हज़ारों कविताएं लिख चुका हूँ, सैंकड़ों छप चुकी हैं और जाने कितनी छपने के इंतज़ार में किसी डायरी किसी कोने में दुबकी पड़ी हैं। मेरे भीतर का कवि भी कुछ समय से शायद सो गया था लेकिन इसे जगाने का सारा दोषारोपण मैं मॉरीशस में विश्व हिंदी सचिवालय के उप-महासचिव गुलशन सुखलाल जी पर करूंगा जिन्होंने एक छोटा-सा ही सही लेकिन शानदार कवितामय आयोजन करके इसे फिर से जगा कर मुखर कर दिया। किसी कवि को जगाना कुंभकर्ण को जगाने से ज्यादा खतरनाक होता है। अब ये कुंभकर्ण की तरह कुछ खाएगा नहीं बल्कि उगलेगा। जब तक ये कवि मन माँ सरस्वती के आगे नतमस्तक होकर कुछ अभिव्यक्त करे, तब तक आप मेरे इन नवगीतों का आनंद लें।
रद्दी अखबार से हम
अभावों की बंजारिन झोली में
रद्दी अखबार-से हम
बिकते रहे बेमौसम ।
लेकर इरादों के स्वेटर में
जगह-जगह झोल
ऐसे पिटे कि जैसे बहरों की बस्ती में ढोल
सिरफिरे वक्त की ठिठोली में
गरीब के त्योहार-से हम
रहे हर बार मुहर्रम ।
रद्दी अखबार-से हम
बंटते रहे-साझे की रखैल
जमीनों की तरह
व्यर्थ ही बहे-मजदूर के विधुर पसीनों की तरह
पड़े रहे मेहनतकश की खोली में
उघड़े प्यार-से हम
लेकर परदों के भ्रम ।
रद्दी अखबार-से हम
तुम बचकर रहना
अब तक सच ने बाजा़र देखे थे
अब सपने होंगे नीलाम
शयन, तुम बचकर रहना।
जाने कब उभर आई अनजाने ही
आंगनों में दरार विभाजन की
सूद-दर-सूद वसूलती चले
जिंदगी: कूर बही महाजन की
चढ़ता ब्याज छोड़ चला विरासत में
अगली पुश्तों के नाम
नन्दन, तुम बचकर रहना।
बस दो आंसू ही मिले विरासत में
और कुछ हमदर्द दर्दों का साथ
वरना तो भरी दोपहरी में भी
साए तक कर गए विश्वासघात
आंखो का खारा अनुदान चखा होंठों ने
कह किशमिशी जाम,
नयन, तुम बचकर रहना।
चाहे जितनी भी दे दो आहुति
कर दो वेदी में कितनी हा-हा
घाती सुख हों या अनुगामी दु:ख
अन्तत: होना है सब कुछ स्वाहा
यज्ञवेदी के मुंह लग गया है
रक्तरंजित प्रणाम,
हवन, तुम बचकर रहना।
लापता हैं मुस्कानें
लापता है मुस्कानें
आंसुओं के इश्तहार हैं
दर्द के महाजन के दोस्तो हम कर्जदार हैं।
वक्त के थपेड़ों में फँस गया होगा
सिर से पांव तक शायद धँस गया होगा
जरूर उसकी भी कोई मजबूरी रही होगी
जो रोते-रोते वह हँस गया होगा
हो सकता है ये मौसम
आपको खुशगवार लगे
सच पूछिए तो भंयकर तूफान के आसार हैं।
आंसुओं में जीना भी मजबूरी है
आंसुओं को पीना भी मजबूरी है
बार-बार उन्हीं जख्मों को उधेड़कर
बार-बार सीना भी जरूरी है
नहीं पा सकते आप
मेरी घुटन का शतांश भी
आपके तो साहब तहखाने तक हवादार हैं।
दर्द का दस्तावेज
दम तोड़ देता है एक पूरा दिन
खुशनुमा सुबह और ढलती हुई शाम के बीच,
भटकती है इसी तरह ये जिंदगी
आरम्भिक रूदन और अन्तिम विराम के बीच।
मानता हूं न बदले हों कभी, ऐसा कोई क्षण नहीं है
क्योंकि इंसानी रिश्तों की मानक व्याकरण नहीं है
आप मिले भी तो ठहरे हुए पोखरी पानी की तरह
दर्द का दस्तावेज था, पढ़ गए आप कहानी की तरह
मैं मैं हूं मित्र कोई विज्ञान नहीं
जो भटकें आप कारण और परिणाम के बीच।
आप व्यर्थ ही त्रेता के धोबी-सा संशय पाले हुए हैं
भगत हो सकते हैं पर बगुले भी कहीं काले हुए हैं
अपराध हमारा यही था, न बगुले हो सके, न भगत हम
आकर यहीं टूट जाता है आपकी व्याकरण का क्रम
एक ही तुला पर मत तोलिए सबको
बहुत अन्तर है गंगाजल और जाम के बीच।
नदी तानाशाह थी
धरती के हर सूखे टुकड़े को
तबाह करने की चाह थी
एक समय था जब नदी तानाशाह थी।
फिर परिधियों में
बांध दिए गए विस्तार
बांधों ने दे दिए किनारों को आकार
मगर अपनी सीमाओं में ही रहे
तो भला फिर नदी उसको कौन कहे
यूं तो शीतल-शीतल लगे मगर
निश्चित ही भीतर दबी एक दाह थी
एक समय था जब नदी तानाशाह थी।
सदियों की मौन पीड़ा से
विद्रोही बनी होगी
खूब खौली होगी तब जाकर कहीं उफनी होगी
चाहे घटी कभी, चाहे बढ़ती रही
बांधों से नदी हमेशा लड़ती रही
अपने उफान, अपने तूफान
अपनी नाव और अपनी मल्लाह थी,
एक समय था जब नदी तानाशाह थी।