उसकी डबडबायी आँखों में तैरते प्रश्नचिह्न त्रिशूल की तरह
सीने में गड़ गए। समीर को लगा जैसे उसने अनुभा की भावनाओं के साथ खिलवाड़ किया था।
दिल के किसी कोने में कसक-सी उठी। एक तीखी हूक ने उसे कुछ सोचने पर विवश कर दिया। “क्या प्यार इसी को कहते हैं कि दिल में
ज़रा-सा दर्द हुआ नहीं और धधकते सीने में धड़कनों का ज्वार शुरु। नहीं..शायद
नहीं..ये तो आकर्षण मात्र है। कितना निश्छल और सात्विक था उसका व्यवहार। मैंने ही
शायद उस अनुराग को आसक्ति समझ लिया। बहुत फ़र्क होता है दोनों में-आसक्ति के तार
तो दोनों तरफ से झनझनाते हैं।” समीर के सीने में विचारों का मंथन लगातार चल रहा था।
लेकिन मन
बड़ा स्वार्थी और कुतर्की होता है। हमेशा अपने पक्ष में ही तर्क-वितर्क करता है।
अपनी ग़लतियों की भी अपने ही पक्ष में तर्कसंगत व्याख्या करता है। समीर का मन भी
तो यही कर रहा था। वह सोच रहा था, “अनुभूति, आग्रह, अनुराग, आसक्ति और अनुभा-ये सब एक ही भाव के
अनुभाव-से लगते हैं। वैसे भी ये सारे वर्ण समधर्मी ही तो हैं। क्या इतना ही काफी
नहीं है अनुभा तक पहुँचने के लिए? मुझे देखकर उसकी अनायास झुकती पलकें, ढुलकता
पल्लू, ‘अमिय हलाहल रसभरी’ आँखों में ‘श्वेत श्याम रतनार’ लज्जा, चुन्नी के किसी कोने को
चुपके-से लपेटती हुई नुकीली अंगुलियाँ-क्या ये सब किसी अनकही प्रीत के कोमल कथानक
के पर्याप्त साक्षी नहीं हैं?” अनुरागी मन के सारे तर्क जब अपने पक्ष में होने लग
जाते हैं तो कौंधते प्रश्न और कसक भरी चुभन समाप्त हो जाती है और दिल के दरिया में
बस रग-रग को झनझना देने वाली लहरियाँ उठने लगती हैं। समीर का मन अब कुछ-कुछ शांत
हो गया था।
अनुभा से
उसकी पहली मुलाकात बड़ी दिलचस्प थी। अनुभा आकाशवाणी के “चर्चित चेहरे” कार्यक्रम को कम्पेयर कर रही थी।
उस दिन उस कार्यक्रम में काव्य के क्षितिज पर बहुत तेजी से उभरते कवि और
साहित्यकार समीर को चर्चित प्रतिभा के तौर पर आमंत्रित किया गया था। कार्यक्रम की
रिकॉर्डिंग के दौरान आकर्षण के अदृश्य तार दोनों तरफ से झनझनाए तो ज़रूर थे। साक्षात्कार
में अनुभा की रसभरी आवाज़ और समीर की बेबाक टिप्पणियाँ बहुत दिनों तक लोगों की
ज़ुबान पर रही थीं। इंटरव्यू करते हुए अनुभा ने उससे पूछा था, “समीर जी, इतनी छोटी-सी उम्र में इतनी लोकप्रियता का क्या राज़ है?”
“ईर्ष्या, जलन, निंदा, आलोचना और कभी-कभी
तिरस्कार।,” समीर ने तपाक से कहा तो अनुभा हैरान रह गई। उसने उतने ही
हैरानी भरे स्वर में पूछा, “मैं आपकी बात का अर्थ समझी नहीं, ज़रा
खुलासा कीजिए।”
समीर ने सहज भाव से कहा, “अनुभा जी, आदमी की ये फितरत है कि जब उसे महसूस होता है कि आप उसके सामने
ही पले बढ़े हैं, उसके बराबर हैं लेकिन तेजी से आगे निकले जा रहे हैं और सफलताएं
आपके कदम चूम रही हैं तो उससे बर्दाश्त नहीं होता। परिणाम होता है- ईर्ष्या, जलन,
निंदा, आलोचना और कभी-कभी तिरस्कार। आज मैं जो कुछ हूँ, इन्हीं की बदौलत हूँ
क्योंकि मैं ऐसी सोच वाले लोगों के बीच से होकर गुज़रा हूँ। सँभलने के पीछे ठोकरों
का अनवरत इतिहास होता है। लोग ठोकरों से घबरा जाते हैं लेकिन मैंने इन्हें अपने संभलने
का संबल बना लिया। लोग आलोचनाओं से भागते हैं लेकिन मैंने इन्हें अपनी सफलता का
श्रृंगार बनाया है। रुकावटें मुझे आगे बढ़ने को प्रेरित करती हैं।”
एक क्षण को अनुभा उसका चेहरा देखती रह गई थी। मंत्रमुग्ध-सी
होकर उसने पूछा था, “ऐसा क्यों होता है समीर कि लोग अपनों द्वारा
ही तिरस्कृत होते हैं।” समीर ने गौर किया कि उसने पहली
बार सिर्फ समीर कहा था, समीर जी नहीं। कानों से ज्यादा दिल को अच्छा लगा। उसने भी उसी
आत्मीयता से फौरन उत्तर दिया,“इसका बड़ा
सहज-सा कारण है अनु।” केवल अनु कहे जाने पर अनुभा भी
चौंकी पर उसके अधरों पर मुस्कुराहट ज्यों की त्यों तैरती रही। समीर ने बड़ी बेबाकी
से कहना जारी रखा, “दरअसल ये इंसानी कमज़ोरी है कि जिसे हम नहीं
जानते, उसकी उपलब्धियों और प्रसिद्धि पर प्रसन्न और चकित होते हैं, उसे सराहते हैं
क्योंकि उससे हमारी सेहत पर कोई असर नहीं पड़ता लेकिन जिसे हम जानते हैं और जो
हमें जानता है, उससे हम कन्नी काटने की कोशिश करते हैं क्योंकि अपने ही बीच
पले-बढ़े किसी व्यक्ति का बढ़ना कहीं न कहीं हमारा अपना कद छोटा करता है। हमारे
भीतर हीनता की भावना पैदा करता है। प्रतिस्पर्धी मन इसे स्वीकार नहीं कर पाता।”
अनुभा ने तब पूछा था, “तो ऐसे में आप कैसा दोस्त, हमदर्द या हमसफर
चाहेंगे।” समीर के शरारती मन ने मौका ताड़ा,
उसने झट से चुलबुले अंदाज़ में कहा, “बहुत कुछ आप जैसा ज़हीन-हसीन और कुछ-कुछ नमकीन।” इस पर दोनों ज़ोर से खिलखिलाकर हँस पड़े।
बात मज़ाक की थी लेकिन अनुभा की प्रतिक्रिया ने पहले से
आकर्षणबिद्ध मन को कुछ और भ्रम दे दिए। अब समीर अनुभा से बात करने और मिलने का कोई
न कोई बहाना निकाल लेता। कभी किसी परिचर्चा में, कभी किसी काव्य गोष्ठी में तो कभी
किसी रेस्तराँ में-दोनों की मुलाकात हो ही जाती। हर नई मुलाकात पिछले प्रसंगों को
और तरोताज़ा कर जाती। हर मुलाकात में समीर उसे छेड़ देता, “अभी तक दोस्त, हमदर्द, हमसफर की तलाश में
हूँ अनु।” अनुभा हँसकर टाल जाती लेकिन समीर
का व्यग्र मन बहुत देर तक सब्र नहीं कर पाया। पुरुषोचित अधीरतावश उसने आखिर अपना
प्रणय-निवेदन कर ही डाला। एक बार तो अनुभा हक्की-बक्की रह गई मगर उसने कोई
प्रतिक्रिया नहीं दी। कई बार आग्रह किए जाने पर उसने समीर को जैसे झिड़क दिया, “किसी से हँसकर बोल देने का अर्थ प्यार तो
नहीं होता समीर।” मुरझाया समीर वापस तो चला आया पर
उसका आग्रही मन उससे बार-बार यही पूछता रहा- वो खफ़ा है तो रहे, इतना बता दे मुझको
मेरे आने की ख़बर पाके सँवरता क्यूँ है।
समीर ने तय कर लिया था कि वह अनु को पाकर ही रहेगा। वह हर
बार कोशिश करता, उसे हर बार झिड़कियाँ मिलतीं। लेकिन हर बार झिड़कियों के स्वर में
पहले से ज्यादा मिठास आती गई और आखिरकार एक दिन झिड़की ने प्यार के आगे घुटने टेक
दिए। दो प्यार भरे दिल एक ही बिंदु पर धड़कने लगे। दोस्ती प्रीत के आँगन में
पहुँची और फिर घनिष्ठता विवाह की दहलीज़ छूने लगी। लेकिन समीर मे महसूस किया कि
विवाह की चर्चा आते ही अनुभा अनमनी-सी हो जाती है। इस चर्चा से कतराने लगती है।
उसे लगा, कहीं न कहीं कोई बात ज़रूर है जो अनु को भीतर ही भीतर मथ रही है। उसकी
आँखों में तैरती सैंकड़ों आशंकाएं अकारण नहीं हो सकतीं। इसके लिए उसके मन को मथना
ज़रूरी था, मंथन से ज़रूर कुछ-न-कुछ निकलता है, भले ही विष क्यों न हो।
मन की ग्रंथियाँ आसानी से नहीं खुलतीं लेकिन आप एक बार
व्यक्ति की दु:खती रग को धीरे से सहला दीजिए, उसके दरकते विश्वास और सहमे यकीन को
ज़रा-सा सहारा दे दीजिए, मन के सारे गुबार खुलने लगते हैं। भीतर का उफान बाहर आ
जाता है। अनुभा के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। सिर टिकाने को समीर का कंधा मिला तो ऊपर
से बहुत कड़क और तेज़तर्रार दिखने वाली अनु बिखर गई। मन का मलाल बाहर आ गया, “समीर, अब तुमसे क्या छिपाना...बस संक्षेप
में इतना समझ लो कि मेरे दोनों भाई सिर्फ जोरू के गुलाम निकले। शादी के चंद दिनों
बाद ही बूढ़े माँ-बाप को छोड़कर अपनी पत्नियों के साथ दूसरे शहरों में चले गए। अब
उनकी जिम्मेदारी मेरे कंधों पर है। अब तुम ही बताओ कि अपने जन्मदाताओं को छोड़कर
मैं शादी करके अलग घर कैसे बसा लूँ?” कहते-कहते वह फफक पड़ी थी।
समीर ने धीमे से पूछा, “मगर अनु, आखिर कब तक तुम इस तरह उनका सहारा
बनोगी?”
“उनके जीते जी तो बन ही सकती हूँ।”
“ठीक है, पर उसके बाद तुम्हारा क्या होगा? तुम्हारी
इच्छाओं और तुम्हारे सपनों का क्या होगा? आज तुम विवाह करना नहीं चाहतीं और कल
चाहकर भी शायद न कर सको क्योंकि तब उम्र और समाज आड़े आ जाएंगे। तब किसके सहारे
गुज़ारोगी ये ज़िदगी? तब तक शायद समीर के इस कंधे पर भी शायद तुम्हारा हक न रह
जाए।”
अनुभा
की आँखों से सैलाब बहने लगा था, फिर भी उसने ख़ुद को संभालते हुए कहा, “तुम अपनी जगह ठीक हो समीर, मगर मैं भी ग़लत
नहीं हूँ। अपने माँ-बाप को असहाय कैसे छोड़ दूँ?”
समीर ने उसके चेहरे को दोनों हाथों में लेते हुए कहा, “मैं कब कह रहा हूँ कि उन्हें असहाय छोड़ दो।
अनु, ये सहारा तो तुम विवाह के बाद भी बन सकती हो। मैं कितना कर पाऊंगा ये तो नहीं
जानता लेकिन तुम्हें इतना यकीन ज़रूर दिलाता हूँ कि तुम अपनी कमाई से अपने माँ-बाप
की जीवन भर सेवा करना चाहोगी तो मुझे कोई एतराज़ नहीं होगा।”
अनु के अधीर मन को राहत मिली लेकिन वह अब भी संयत नहीं हो
सकी थी। उसने अटकते हुए स्वर में कहा, “लेकिन मेरे मन में एक और बहुत बड़ी शंका है समीर। तुम सुनोगे
तो कहोगे कि आधुनिक युग की एक लड़की इस तरह की बात कह रही है। मैं आधुनिक समाज में
ज़रूर रह रही हूँ लेकिन रीति-रिवाज़ों को मानने वाले पुरातनपंथी परिवार की लड़की
हूँ।”
“तुम कहना क्या चाहती हो अनु?,” समीर थोड़ा कंफ्यूज़ हो गया था।
“समीर, मैं और मेरा परिवार ज्योतिष में बहुत
विश्वास रखते हैं और एक बहुत पहुँचे हुए ज्योतिषी ने मेरा हाथ देखकर बहुत पहले ही
बता दिया था कि मेरे हाथ में विवाह की रेखा ही नहीं है।”
समीर
खिलखिलाकर हँस पड़ा, “विवाह की रेखा ही नहीं है, तो चलो कोई बात नहीं मैं विवाह करूंगा
तो बन जाएगी।”
अनुभा
ने बीच में ही उसे काटते हुए कहा, “सिर्फ इतना ही नहीं समीर, उन्होंने तो यह भी कहा है कि यदि
मैंने जबरन विवाह की कोशिश की तो मेरे विवाह के कुछ समय पश्चात ही मेरे पति की
मृत्यु हो जाएगी और मैं अपनी आँखों के सामने तुम्हें....।” बह बुरी तरह फफक पड़ी। समीर ने उसके मासूम चेहरे को
हाथों में लेकर कहा, “बस इतनी सी बात जिसमें तुम दुबली हुई जा रही हो, पगली कहीं की।”
“ये इतनी सी बात नहीं है समीर, मेरे माँ-बाप
के अलावा मेरे होने वाले जीवनसाथी के जीवन का भी प्रश्न है। मैं उसका जीवन दाँव पर
नहीं लगा सकती।”
अब
समीर ने गंभीर होकर कहा, “लेकिन अपना जीवन दाँव
पर लगा सकती हो? अनु, मैं तुम्हारी भावनाओं की कद्र करता हूँ। ज्योतिषशास्त्र और
हाथों की रेखाओं पर भी विश्वास करता हूँ। ये रेखाएं बहुत कुछ बोलती हैं लेकिन सब
कुछ नहीं बोलतीं। सब कुछ बोलें भी तो ज़रूरी नहीं कि हम सब कुछ समझ जाएं। अंतिम
सत्य तो सिर्फ विधाता जानता है। हम तो केवल अनुमान लगा सकते हैं। अब उन संभावनाओं
और अनुमानों के लिए जिंदगी की सच्चाइयों से तो मुँह नहीं मोड़ा जा सकता।”
समीर का बोलना जारी था, “ जो हो सकता है-उसके लिए, ‘जो हो रहा है’ या ‘जो होने को
तैयार है’ उसे तो छोड़ा नहीं जा सकता। मान लो तुम्हारे बारे
में ज्योतिषी की गणना ग़लत हुई तो उस दिन किस ज्योतिषी से जाकर अपनी उम्र के
गुज़रे सालों का हिसाब माँगोगी?”
“और गणना सच हुई तो?” अनुभा ने सुबकते हुए कहा।
“मान लो सच हुई तो भी जो होना है वो तो होकर
ही रहेगा, तुम्हारे या मेरे कहने से तो रुकेगा नहीं। तो क्या जो भावी है, उसके
घटने तक हम बैठकर उसका इंतज़ार ही करते रहें? सच तो ये भी है कि एक दिन मरना है,
हर हाल में मरना है तो क्या आज से ही जीना छोड़ दें और मौत की प्रतीक्षा करें?
नहीं, अनु नहीं, अघटित की कल्पना कर लेने से जीवन रुकता नहीं है। अब ये तुम्हारे
हाथ में है कि तुम्हें भविष्य के अंधकार में डूबे भाग्य की अनदेखी रेखाओं के फल की
प्रतीक्षा करनी है या अपने सामने बाँह पसारे अपने वर्तमान का हाथ थामकर आगे बढ़ना
है और अपना भविष्य खुद संवारना है। वर्तमान का हाथ थामो, भविष्य से हम निपट लेंगे।”
अनुभा ने क्षण भर को समीर की तरफ देखा
और फिर एक गहरे निश्चय के साथ उसके बढ़े हुए हाथों को अपने हाथों में थाम लिया।
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