नवगीतकार
के रूप में जिंदगी के पिछले अध्यायों को खोलता हूँ तो अपने ही कुछ नवगीत अनायास दिल के
करीब आ जाते हैं जिन्हें मैंने भी बहुत दिल से लिखा था। मुझे अपने शहर और आसपास के
शहरों के कवि मंचो पर शोहरत दिलाने वाले इन नवगीतों को मैं आज भी अपने दिल के उतने
ही करीब रखता हूँ। ऐसे ही कुछ नवगीत आपसे बाँट रहा हूँ, ब्लॉग पर आपकी प्रतिक्रिया
की उत्सुकता से प्रतीक्षा रहेगी। आपको एक जानकारी और दे दूं कि भारतीय विद्या भवन,
नई दिल्ली से ज्योतिषाचार्य भी होने के नाते जल्दी ही इस ब्लॉग पर मैं ज्योतिष से
संबंधित रोचक बातें आपके साथ साझा करूंगा और कुछ महत्वपूर्ण विषयों पर विस्तार
से जानकारी भी दूंगा। फिलहाल ये नवगीत-
सपनों की दुनिया में चल
चल उठ पागल मन,
सपनों की दुनिया में चल।
ऐसे अवसर मुझको
चंद मिले हैं
जब भाव, शब्द और छंद मिले हैं
तप-से निखरे तेरे बिरहा की अग्नि में जल।
जब-जब भीतर झांका खण्डहर मिले
बाहर देखा तो
बिखरते नर मिले
आंखों की बर्फ में गया सुनहरा सूरज गल।
जिन्दगी फकीर है मत अपनी कह
खारे
आंखों के नीर आंखों में रह
अस्ताचल में है सूरज, जिन्दगी रही है ढल।
अश्रुओं को शिव का गरल समझ पी जा
वक्र प्रेम-पथ है, सरल समझ जी जा
अभी बिछुड़ेंगे कितने ही दमयन्ती और नल।
YYYYY
एक नदी मेरे भीतर
बहती है एक नदी मेरे भीतर।
मन के ही मौसम के अनुकूल
तरल करती हे दृगों के कूल
यह नदी है अजस्र
तरलता की
भीतर छिपी दमित सरलता की
कैसी ये त्रासदी
मेरे भीतर।
एक है युधिष्ठिर, एक दुर्योधन
दो हिस्सों में बँटा है ये
मन
जब भी यह दुर्योधन बचा है
उसने बस कुचक्र ही रचा है
नग्न है द्रौपदी मेरे
भीतर।
कुछ भी नहीं किसी से कहती है
यह नदी बस चुपचाप बहती है
हर बार के वहशी जुनून में
सनी है यह अपने ही खून में
आहत है एक सदी मेरे भीतर।
YYYYY
विश्वास अपनी पीढ़ी के
अच्छा काटना चाहो
तो बन्धु अच्छा ही बोना होगा
अन्यथा मित्र !
जिंदगी भर
अपने किए पर रोना होगा।
गल चुके हैं पाये बुजुर्गों से विरासत में मिली सीढ़ी के
अब हमें ही संभालने हैं
आखिर विश्वास अपनी पीढ़ी के
वक्त से लड़ना है दोस्त
पत्थरों पर भी सोना होगा।
कुछ इस पार, कुछ उस पार और कुछ बीच में खड़ी हैं दीवार
एक कागज की नाव नदी में, हजार यात्रियों के इश्तहार
दूसरे जा सकें पार
इसलिए पुल तुम्हें होना होगा।
जिंदगी व्यवसाय नहीं है
जो लुटाते हो अनुबंधों
पर
तुम तब तक ही जीवित हो
बंधु, हो जब तक अपने कंधों पर
जैसे
भी हो संभव
बोझ अपना स्वयं ही ढोना होगा।
YYYYY
बोलेंगे एक दिन
अपनी जुबान खोलेंगे एक दिन
ये पत्थर भी बोलेंगे एक
दिन।
शोख प्रियतमा है नदी, धारा भुजाएं हैं
आलिंगन में जिनके मीलों बहते आए हैं
रेत-रेत होकर पथरीला तन बिखर
गया है
समर्पण का अल्हड़
अध्याय पर निखर गया है
टुकड़ा-टुकड़ा हो लेंगे एक
दिन
ये पत्थर भी बोलेंगे एक
दिन।
ये माना कि ये बोलने के
काबिल नहीं होते
ये पत्थर तो हैं मगर पत्थरदिल नहीं होते
इनके होंठों पर चुप्पी का
पहरा होता है
दिखता नहीं है जो
वह घाव गहरा होता है
पर हँसकर ही डोलेंगे एक दिन
ये पत्थर भी बोलेंगे एक दिन।
YYYYY
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