सोमवार, 16 जुलाई 2012

क्या आपका बच्चा राहु से प्रभावित है?

          जैसा मैंने आपसे वायदा किया था, मैं आज से ज्योतिष संबंधी कुछ विषयों को आपके समक्ष रखने जा रहा हूँ। उम्मीद करता हूँ कि आपको पसंद आएंगे। शुरुआत राहु से कर रहा हूँ जिसपर विचार किए बिना आज का ज्योतिष पूरा हो ही नहीं सकता। जीवन के विभिन्न पक्षों को समझने के लिए कुंडली में राहू को समझना बहुत महत्वपूर्ण है। बिना उसे समझे आप कहीं न कहीं चूक जाएंगे।
            कुंडली में तमाम बातें देखने के अलावा यह भी देख लेना चाहिए कि कहीं आपका बच्चा राहु से प्रभावित तो नहीं है? क्या उसमें चोरी करने, झूठ बोलने, तरह-तरह की कहानियाँ बनाने, मिनटों में रंग बदल लेने की आदत है?कहीं वह ऐसी कहानियाँ तो नहीं बनाता कि आपको न चाहते हुए भी विश्वास करना ही पड़े, वह कहानियाँ बनाने में तो इतना माहिर है कि असलियत की तो वह भनक भी नहीं लगने देता तो शायद ये लेख शायद आपके काम का हो सकता है। आइए इस पर विस्तार से चर्चा करें।
            किसी भी ज्योतिषीय चर्चा करने से पूर्व आइए पहले राहु और केतु के बारे में थोडा सा जान लें। ज्योतिष में सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, वृहस्पति, शुक्र और शनि के अलावा राहु एवं केतु को भी ग्रह का दर्जा दिया गया है और वे किसी भी व्यक्ति की कुंडली में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। आजकल जिस कालसर्प योग की चर्चा बड़े जोर-शोर से की जाती है,वह भी राहु-केतु की बदौलत ही बनता है। कुछ ज्योतिष विशारदों ने राहु की उच्च राशि वृष को माना है तो कुछ ने मिथुन को और इसी हिसाब से उसकी नीच राशि वृश्चिक या धनु मानी गई हैं जबकि केतु के मामले में ठीक इससे उल्टा है। उसकी उच्च राशि वृश्चिक या धनु है और नीच वृष या मिथुन। कन्या राशि को राहु की स्वराशि माना जाता है। ये दोनों ही छाया ग्रह माने गए हैं। भूगोल की दृष्टि से भी ये चंद्रमा और पृथ्वी की छायाएं ही हैं जो ग्रहण लगाती हैं। जिस तरह चंद्रमा के बेहद करीब होने के कारण उसकी किरणें मानव जीवन पर बहुत अधिक प्रभाव डालती हैं,उसी प्रकार ये छायाएं भी उतनी ही प्रभावशाली हैं। आज के ज्योतिष में राहु और केतु दोनों ही बहुत महत्वपूर्ण ग्रह हैं और व्यक्ति के जीवन में बड़ा प्रभाव डालते हैं।
क्या आपने राहु-केतु से संबंधित पौराणिक कथा सुनी है?चलिए पहले उसी की संक्षेप में चर्चा कर  लेते हैं। लेकिन इस कथा का सार लिखने से पूर्व इतना जरूर कहना चाहूँगा कि हमारे ऋषियों-मुनियों ने जितनी भी कथाएं लिखी हैं,वे सब केवल वही अर्थ नहीं देती जो ऊपरी तौर पर दिखाई देता है। हर कथा सांकेतिक और प्रतीकात्मक है। उनके पीछे अनेक रहस्य छुपे हुए हैं, ठीक वैसे ही जैसे बीज मंत्रों के पीछे रहस्यों का भंडार है। ये रहस्य हर किसी के लिए नहीं खुलता। जब आप स्वयं या गुरुकृपा से वहाँ तक पहुँचेंगे या ईश्वर कृपा होगी,तभी ये रहस्य समझ में आते हैं। साधारण रूप से हम कहानी के ऊपरी अर्थों में ही उलझे रह जाते हैं। भीतरी अर्थों तक पहुँच ही नहीं पाते। ज्योतिष के संदर्भ में समुद्रमंथन से लेकर राहु-केतु की कथा भी ऐसी ही है जो अनेक संकेतों, प्रतीकों और गहरे अर्थों से परिपूर्ण है, आवश्यकता है तो सिर्फ आपकी दृष्टि में गहराई की।
 पौराणिक कथाओं के अनुसार, समुद्रमंथन के दौरान जब अन्य वस्तुओं के अलावा अमृतकलश निकला तो देवों और दानवों में उसे पा लेने के लिए युद्ध छिड़ गया। तब भगवान विष्णु मोहिनी का रूप धारण करके वहाँ प्रकट हो गए। उनकी खूबसूरती और अदाएं देखकर युद्ध शांत हो गया और सभी का ध्यान उस रूपमती की ओर केंद्रित हो गया। विष्णुरूपी उस रूपमती बाला ने देवों और दानवों से दो अलग-अलग पंक्तियों में बैठ जाने को कहा। देव और दानव अलग-अलग पंक्तियों में बैठ गए और वह रूपमती दो अलग-अलग कलशों से उन्हें अमृत पिलाने लगी। लेकिन वस्तुतः यह छल था। एक कलश में अमृत था जिसे भगवान विष्णु देवों को पिला रहे थे और दूसरे कलश में अमृतरहित द्रव था जिसे दानवों को पिलाया जा रहा था। सारे देव और दानव उस रूपमती  के रूप से मोहित होकर बस चुपचाप पिए जा रहे थे-बिना यह जाने कि किसे अमृत पिलाया जा रहा है और किसे नहीं।
          लेकिन तेजतर्रार राहु की निगाहों से भगवान विष्णु का यह छल छुप नहीं सका। उसने फौरन ताड़ लिया कि छल हो रहा है और वह रूप बदलकर देव बन गया। चुपचाप जाकर देवों की पंक्ति में बैठ गया। यह काम उसने इतनी चालाकी से किया कि न तो देवता ही जान पाए और न ही दानव। और तो और इस चालाकी से भगवान विष्णु भी धोखा खा गए। जैसे ही उसकी बारी आई, भगवान विष्णु  ने उसकी अंजुलि में भी अमृत डाल दिया। लेकिन राहु की इस चालाकी को अब सूर्य और चंद्रमा ताड़ गए थे और उन्होंने तुरंत ही भगवान विष्णु को इशारा कर दिया। तब तक भगवान विष्णु अमृत को उसकी अंजुलि में डाल चुके थे और उसने उसका पान भी कर लिया। लेकिन अमृत के कंठ से नीचे जाने से पहले ही भगवान विष्णु साक्षात प्रकट हो गए और उन्होंने अपने सुदर्शन चक्र से उसकी गर्दन काट दी। अमृत कंठ ने नीचे न उतर सका और उस शरीर के दो हिस्से हो गए। अमृतपान करने वाला सिर अमर हो गया और राहु कहलाया जबकि शेष धड़ केतु के रूप में जाना गया। कहते हैं कि सूर्य और चंद्रमा द्वारा अपनी चुगली किए जाने और मारे जाने से नाराज होने के कारण ही राहु चंद्रमा और सूर्य पर ग्रहण लगाता है। उन्हें लगातार ग्रसकर अपना बदला लेता है। ये कहानी तो छोटी-सी है लेकिन इसमें अर्थ बहुत सारे छुपे हुए हैं। जरा नीचे लिखी बातों पर गौर कीजिए।
          राहु की तीव्र दृष्टि और बुद्धि चातुर्य देखिए। किसी भी देव अथवा दानव को भगवान विष्णु  द्वारा किए जा रहे छल का पता नहीं चला। यह केवल राहु की ही तीव्र दृष्टि थी जिसने इस छल को पकड़ लिया। और उसका बुद्धि चातुर्य यह था कि वह अगर चाहता तो सबको असलियत बता सकता था लेकिन ऐसे में उसे अमृत मिल पाने के अवसर कम हो जाते,इसलिए उसने किसी को भी नहीं बताया और चुपचाप जाकर देवों की पंक्ति में बैठ गया और अमृत ले ही लिया। इससे उसकी चालाकी और उसका स्वार्थभाव भी छलकता है। जो चालाकी भगवान विष्णु ने उसके साथ रूप बदलकर की,वही उसने विष्णु जी के साथ कर दी। उनको उन्हीं की चाल से परास्त किया। उसकी सबसे बड़ी खूबी यह रही कि उसने तो भगवान विष्णु का राज जान लिया लेकिन उन्हें इस बात का आभास भी नहीं होने दिया कि वह उनके राज को जानता है और उन्हें उन्हीं के दाँव से परास्त कर अमृत हासिल कर लिया। इसका अर्थ यह हुआ कि आप राहु की चालाकी नहीं पकड़ सके लेकिन वह आपकी चालाकियाँ जानता है और इस बात को प्रकट भी नहीं होने देता कि वह जानता है। इससे भविष्य में उसे आपकी और भी चालाकियाँ जानने का अवसर मिलेगा।
          दानवों में सिर्फ उसे ही अमृत मिल जाए, इसलिए उसने किसी अन्य दानव को यह बात बताई ही नहीं। इससे उसका स्वार्थभाव झलकता है। वह छल-कपट करने अर्थात दूसरों को धोखा देने और रूप बदलने में माहिर है,इसलिए जब वह रूप बदलकर देव बना तो न तो देव जान सके और न ही दानव। अंतिम क्षणों में सूर्य और चंद्र को जरुर पता चला। लेकिन तब तक देर हो गई थी और वह अमृत पी चुका था। उसके भीतर प्रतिशोध की तीव्र ज्वाला है,तभी तो वह अपनी चुगली करने वाले चंद्रमा और सूर्य को सदियों से डसता आ रहा है।
          इस कथा का ज्योतिष के संदर्भ में प्रच्छन्न अर्थ यह है कि जन्मकुंडली में जिस बच्चे/व्यक्ति पर  राहु का खास प्रभाव होता है,उसके भीतर जाने-अंजाने वे सारे अवगुण जा जाते हैं जो राहु की इस कथा में है। ऐसे व्यक्ति का शातिर-दिमाग होता है और वह सामने वाले के मन को पढ़ सकने में सक्षम होता है। यदि उसके साथ कोई छल या कपट किया जा रहा है तो वह तुरंत ताड़ जाता है लेकिन आपको कभी अहसास नहीं होने देगा कि उसे आपकी चालाकी या छल के बारे में कुछ भी पता है। वह पहले की तरह ही मासूम बना रहेगा। झूठ बोलने में ऐसे व्यक्ति का कोई सानी नहीं होता। झूठी कहानियाँ गढ़ने में उसका मुकाबला शायद ही कोई कर पाए। कहानियाँ भी वह ऐसा गढ़ेगा कि आप का मन माने या न माने पर उन पर आपको अपने यकीन करना ही पड़ेगा। ऐसा बच्चा या व्यक्ति स्वार्थी होता है और यदि कई स्वार्थ सामने आ रहे हैं तो वह पहले अपने स्वार्थ के बारे में ही सोचता है। अपना काम निकल जाने पर ही आपको इस बारे में बताएगा। प्रतिशोधी भी ऐसा होता है कि जिसकी आप कल्पना ही नहीं कर सकते। जैसा कि ऊपर चर्चा भी की जा चुकी है, वह आपको आपके ही दाँव से परास्त करने वाला होता है। आपकी चालों का जानकर भी आपको इसकी हवा न लगने देने उसकी सबसे बड़ी खासियत है। द्वितीय भाव में राहु का असर आ रहा हो तो वह अपशब्द बोलने में भी नहीं हिचकता। जरा अपने आसपास के बच्चों और व्यक्तियों पर निगाह डालिए,देखिए वे कहीं इसी तरह का व्यवहार तो नहीं करते। यदि करते हैं तो वे राहु के प्रभाव में हो सकते हैं। यह प्रभाव कितना है और क्यों है, एक अच्छा ज्योतिष कुंडली देखकर आसानी से बता सकता है। पता चलने पर इसके निवारण के उपाय भी किए जा सकते हैं।

मंगलवार, 10 जुलाई 2012

कुछ नवगीत-नए पुराने


नवगीतकार के रूप में जिंदगी के पिछले अध्यायों को खोलता हूँ तो अपने ही कुछ नवगीत अनायास दिल के करीब आ जाते हैं जिन्हें मैंने भी बहुत दिल से लिखा था। मुझे अपने शहर और आसपास के शहरों के कवि मंचो पर शोहरत दिलाने वाले इन नवगीतों को मैं आज भी अपने दिल के उतने ही करीब रखता हूँ। ऐसे ही कुछ नवगीत आपसे बाँट रहा हूँ, ब्लॉग पर आपकी प्रतिक्रिया की उत्सुकता से प्रतीक्षा रहेगी। आपको एक जानकारी और दे दूं कि भारतीय विद्या भवन, नई दिल्ली से ज्योतिषाचार्य भी होने के नाते जल्दी ही इस ब्लॉग पर मैं ज्योतिष से संबंधित  रोचक बातें आपके साथ साझा करूंगा और कुछ महत्वपूर्ण विषयों पर विस्तार से जानकारी भी दूंगा। फिलहाल ये नवगीत-

सपनों की दुनिया में चल  

चल उठ पागल मन,
            सपनों की दुनिया में चल। 

ऐसे  अवसर  मुझको चंद  मिले हैं
जब भाव,  शब्‍द और छंद  मिले हैं

तप-से निखरे तेरे बिरहा की अग्‍नि में जल।


            जब-जब भीतर झांका खण्‍डहर मिले
बाहर  देखा  तो बिखरते  नर मिले

आंखों की बर्फ में गया सुनहरा सूरज गल।


            जिन्‍दगी फकीर है मत अपनी कह
खारे आंखों के नीर  आंखों में रह

अस्‍ताचल में है सूरज, जिन्‍दगी रही है ढल।


            अश्रुओं को शिव का गरल समझ पी जा
वक्र  प्रेम-पथ है,  सरल समझ  जी जा

अभी बिछुड़ेंगे कितने ही दमयन्‍ती और नल।
YYYYY


                      एक नदी मेरे भीतर

बहती है एक नदी मेरे भीतर। 

            मन के ही मौसम के अनुकूल
            तरल करती हे दृगों के कूल
यह नदी है  अजस्र तरलता की
भीतर छिपी दमित सरलता की

 कैसी ये त्रासदी मेरे भीतर। 

            एक  है युधिष्ठिर, एक दुर्योधन
            दो  हिस्‍सों में बँटा  है  ये मन
                        जब भी यह दुर्योधन बचा है
                        उसने बस कुचक्र  ही रचा है

नग्‍न है द्रौपदी मेरे भीतर।


            कुछ भी नहीं किसी से कहती है
            यह नदी बस चुपचाप बहती है
                        हर बार के वहशी जुनून में
                        सनी है यह अपने ही खून में

आहत है एक सदी मेरे भीतर।
YYYYY


            विश्‍वास अपनी पीढ़ी के  

अच्‍छा काटना चाहो
            तो बन्‍धु अच्छा ही बोना होगा

            अन्‍यथा मित्र ! जिंदगी भर
अपने किए पर रोना होगा।



गल चुके हैं पाये  बुजुर्गों से विरासत में  मिली  सीढ़ी के
अब हमें ही संभालने हैं आखिर विश्‍वास अपनी पीढ़ी के  

            वक्‍त से लड़ना है दोस्‍त
                        पत्‍थरों पर भी सोना होगा। 

कुछ इस पार, कुछ उस पार और कुछ बीच में खड़ी हैं दीवार
एक कागज की नाव नदी में, हजार  यात्रियों  के  इश्‍तहार

            दूसरे जा सकें पार
                        इसलिए पुल तुम्‍हें होना होगा। 

जिंदगी   व्‍यवसाय   नहीं  है  जो  लुटाते  हो  अनुबंधों  पर
तुम तब तक ही जीवित हो बंधु, हो जब तक अपने कंधों पर

जैसे भी हो संभव
                        बोझ अपना स्‍वयं ही ढोना होगा। 
YYYYY


     बोलेंगे एक दिन 

अपनी जुबान खोलेंगे एक दिन
ये पत्‍थर भी बोलेंगे एक दिन। 

शोख प्रियतमा है नदी, धारा भुजाएं हैं
आलिंगन में जिनके मीलों बहते आए हैं

         रेत-रेत होकर पथरीला तन बिखर गया है
                     समर्पण का अल्‍हड़ अध्‍याय पर निखर गया है 

टुकड़ा-टुकड़ा हो लेंगे एक दिन
ये पत्‍थर भी बोलेंगे एक दिन।


ये माना कि ये बोलने के काबिल नहीं होते
ये पत्‍थर तो हैं मगर पत्‍थरदिल नहीं होते

         इनके होंठों पर चुप्‍पी का पहरा होता है
                     दिखता नहीं है जो वह घाव गहरा होता है 

पर हँसकर ही डोलेंगे एक दिन
ये  पत्‍थर भी बोलेंगे एक दिन। 
YYYYY